बेसल मानदंड क्या है और इसके कितने प्रकार है?
Reserve Bank Of India ने बेसल कमेटी के द्वारा 1988 में आरम्भ किया गया Capital adequacy मापन से सम्बन्धित Risk asset ratio Indian Banks के लिए 1992 में शुरू किया। विश्व के अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं की तरह भारत में भी बेसल I मानदंडों को वर्ष 1999 में अपनाया गया। बेसल I मानदंडों के अपनाने का प्रत्यक्ष असर भारत के Scheduled commercial Banks पर देखा गया। इन Bank की गैर-निष्पादक परिसंपत्तियों (Non-performing assets) यानी NPA कुल साख का वर्ष 1997-98 के 8.1 प्रतिशत से गिरकर वर्ष 2003-04 में 2.9 प्रतिशत आ गया। यहाँ तक कि | वित्तीय वर्ष 2003-04 में NPA में निरपेक्ष में गिरावट दर्ज की गई। बेसल I की सफलता से आशान्वित होकर ही Reserve Bank Of India ने भारत में Financial institutions के लिए बेसल II मानक अपनाने पर बल दिया।
Reserve Bank Of India के अनुसार भारतीय Bank Basel III के अनुसार नए पूँजी नियमों को आसानी से लागू कर लेंगे। Reserve Bank Of India के मुताबिक भारतीय Banks में कुल पूँजी और Risky assets का अनुपात 30 जून, 2010 को 11.7 प्रतिशत था जबकि Basel III नियमों के अनुरूप इसे 10,5 प्रतिशत ही होना चाहिये। भारतीय Banks के पास Tier I पूँजी 9 प्रतिशत है जबकि Basel III नियमों के मुताबिक 8.5 प्रतिशत आवश्यक है। हालांकि कुछ भारतीय Bank Basel III नियम के पालन के क्रम में पूँजी की कमी की स्थिति का सामना कर सकते हैं।
बेसल मानदंड क्या है? What is Basel Norms in Hindi?
Bank Supervision पर बेसल कमेटी (Basel Committee on Bank Supervision-BCBS) समझौतों का एक सेट जो Capital Risk, Market Risk तथा Operational Risk के संदर्भ में Banking regulators पर सिफारिशें देती हैं। मानदंडों के मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि Financial Institution अपनी Liabilities व अप्रत्याशित घाटों की पूर्ति के लिए पर्याप्त पूँजी अपने पास सुरक्षित रखें। Read more...
















