सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा है आर.एस.एस. : सरदार वल्लभ भाई पटेल के पत्र का एक अंश
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ या आर.एस.एस. (RSS) एक ऐसा नाम है जिसके नाम मात्र से ही राजनैतिक गलियारों में हलचल मच जाती है। इसकी स्थापना भले ही 1925 में हुई हो लेकिन इसकी जड़ें इससे पूर्व भी तलाशी जा सकती हैं। आर.एस.एस. के संस्थापक डॉ केशव राओ बलराम हेडगेवार थे।उनका जन्म नागपुर में हुआ था ,डाक्टरी की पढाई करने वह नागपुर से कलकत्ता आए थे। इस ही दौरान वह क्रांतिकरी संगठन अनुशीलन समिति के संपर्क में आए और इसके सदस्य भी बने इस दौरान हेडगेवार को जेल भी जाना पड़ा। लेकिन कुछ समय बाद वह बाल गंगाधर तिलक के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए और काफी समय तक उन्होंने कांग्रेस का साथ दिया लेकिन 1917 में तुर्की के खलीफा की कुर्सी छीने जाने के विरोध में सारे हिंदुस्तान में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत हुई और गाँधी जी की अगुवाई में कांग्रेस ने भी इसका समर्थन किया।
डॉक्टर हेडगेवार को कांग्रेस के द्वारा खिलाफत आंदोलन से जुड़ने वाली हर बात परेशान कर रही थी ।क्यूंकि उन्होंने इसे मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीती माना हालाँकि नाराज़गी के बाद भी हेडगेवार कांग्रेस का हिस्सा बने रहे और उन्होंने कांग्रेस को नहीं छोड़ा।यहाँ तक की आर एस एस कि स्थापना के बाद भी वह कांग्रेस से जुड़े रहे लेकिन इस घटना के बाद हेडगेवार के दिमाग़ ने उन्हें कुछ और ही सोचने पर मजबूर कर रखा था।
उन्होंने एक ऐसी संस्था का निर्माण करने का मन बना लिया था जो हिन्दू हितों को ले कर चले और आगे बढे। और इसकी शुरुआत उन्होंने अपने घर से करना ज़रूरी समझा। कहा जाता है कि हेडगेवार को सुनने के लिए पहले तो महज़ 12 लोग ही पहुंचे थे लेकिन धीरे -धीरे समय बदला और एक समय ऐसा भी आया कि हजारों की संख्या में लोग हेडगेवार को केवल सुनने आते थे और उनके विचारों से प्रभावित होने लगे थे।
संघ की स्थापना का रास्ता साफ होता नज़र आ रहा था। यह काम हेडगेवार के लिए इतना आसान नहीं था। कई सारी समस्याएँ थीं। कहा जाता है की हेडगेवार ने खुद शाखा लगाना शुरू किया , शाखा में योग,सूर्य नमस्कार,लाठी प्रशिक्षण के साथ-साथ बौद्धिक चर्चा को भी शामिल किया गया। धीरे-धीरे हेडगेवार की विचारधारा से प्रभावित हो कर अधिक से अधिक संख्या में लोग शाखा से जुड़ने लगे और हेडगेवार ने इस संगठन को औपचारिक रूप देने का मन बना लिया। साल 1925 में नागपुर में विजयदशमी के दिन संघ की नीव रखी गई।देखते ही देखते महाराष्ट्र के कई इलाक़ों में संघ ने अपने पैर जमाने शुरू कर दिए महाराष्ट्र के साथ मध्य भारत में भी संघ का विस्तार हुआ। संघ में सक्रिय लोगों की संख्या बढ़ तो बहुत तेज़ी से रही थी लेकिन महाराष्ट्र के बाहर अब भी इसका कोई खास अस्तित्व नहीं था।
संघ को महाराष्ट्र के बाहर पैर पसारने का मौक़ा 1930 के आस-पास मिला जब हेडगेवार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय पहुंचे और पंडित मदन मोहन मालवीय ने संघ के कार्य को बी.एच.यु परिसर में स्थापित करने की अनुमति दे दी।
बी.एच.यु. में हेडगेवार की मुलाक़ात एम्.एस.सी. की पढाई कर रहे माधव राओ सदाशिवराव गोलवरकर से हुई। वह बी.एच.यु. में शिक्षक भी थे इसलिए उन्हें गुरु जी के नाम से भी जाना जाता था। हेडगेवार के ज़रिये ही गोलवरकर एक सक्रिय सदस्य बने।1940 में हेडगेवार की मृत्यु के बाद सर्व सम्मति से संघ की कमान गोलवरकर को सौंप दी गई ।गोलवलकर के नेतृत्व में संघ का विस्तार दिल्ली,कलकत्ता,चेन्नई और लाहौर के साथ-साथ सारे देश में हो रहा था लेकिन संघ में सब ही वर्ग के लोग अब भी नहीं जुड़े थे।
दलित वर्ग इस संगठन से बिलकुल अलग था फिर भी संघ का विस्तार व्यापक पैमाने पर हो चुका था परन्तु इस विस्तार के साथ ही संघ पर कई बड़े आरोप भी लगे जिसमे एक था राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या से जुड़ा आरोप भी शामिल था ।महात्मा गाँधी की हत्या के बाद ना केवल भारत ने बल्कि पूरे विश्व ने जाना कि विश्व हिन्दू परिषद् के अलावा भी हिंदूवादी विचारधारा रखने वाला कोई संगठन है जिसका नाम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है।क्यूंकि हिन्दू महासभा से ताल्लुक़ रखने वाले नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या की थी जो की संघ का सक्रिय सदस्य भी था लेहाज़ा सारी उँगलियाँ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर उठीं।
तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आर.एस.एस. पर प्रतिबन्ध भी लगा दिया।गोलवरकर ने संघ के प्रतिबन्ध पर आपत्ति जताई वही तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू चाहते थे की संघ पर हमेशा के लिए पाबन्दी लगा दी जाए लेकिन पर्याप्त सबूतों के आधार पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने ऐसा करने से इंकार कर दिया और जुलाई 1949 में संघ पर से प्रतिबन्ध हटा दिया गया। प्रतिबन्ध भले ही हट गया हो लेकिन 18 जुलाई 1948 को सरदार पटेल ने हिन्दू महासभा के सदस्य जो कि उनके ही कैबिनेट के मंत्री थे डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक पत्र लिखा था । उस पत्र का कुछ अंश इस प्रकार है:
“जैसा कि आरएसएस और हिंदू महासभा के संबंध में, गांधीजी की हत्या से संबंधित मामला उप-न्यायिक है और मुझे दोनों संगठनों की भागीदारी के बारे में कुछ भी कहना पसंद नहीं करना चाहिए, लेकिन हमारी रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि इन दोनों की गतिविधियों के परिणामस्वरूप निकायों, विशेष रूप से पूर्व, देश में एक ऐसा माहौल बनाया गया था जिसमें इस तरह की भीषण त्रासदी संभव हो गई थी। मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का चरम तबका इस साजिश में शामिल था। आरएसएस की गतिविधियों ने स्पष्ट कर दिया। सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा है।”
18.7.48
वल्लभ भाई पटेल
वल्लभ भाई पटेल के ये शब्द ही इतना समझने के लिए काफी हैं कि यह संस्था अपने आरम्भ से ही अलग तरह के विवादों और समस्याओ को खींच रही थी। आज भी लोग इस संस्था के पक्ष या विपक्ष में देखने को मिल जाते हैं।
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