सूरज से मुझे मिलना है
ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ना कठिन होता है दर्द का एहसास हर पल होता है ठंडी बर्फीली हवाएं शरीर तोड़ देती हैं जितना ऊंचा चढ़ो साँस उतना साथ छोड़ देती है
एक हिमस्खलन आता है और सब कुछ ध्वस्त हो जाता है दिल अपने बिछड़े हुए लोगों और अपने सामान को खोजता है दिन भर की चढ़ाई के दौरान मैं बिखरता हूँ और फिर से एकजुट होता हूँ ठण्ड से झुलसे हाथों को रगड़ते हुए थोड़ी गर्मी को पकड़ता हूँ
खतरों और रोमांच से भरा है यह पहाड़ों का सफर कभी दिल बैठ जाता है तो कभी उठ जाता है दिन गर्म हो या सर्द, उत्साह रक्त में बढ़ता जाता है आपका सच ही आपको शक्ति देता जाता है
किस्मत कितना नीचे गिरायेगी हर बार गिर कर चढ़ना मुझे आता है मुझे अपने प्रयास के साथ इन्तजार करना होगा पर्वत के शिख़र पर ही सूर्य का रथ सबसे पहले आता है
मेरे कांपते हाथों में एक पताका है सबसे ऊंचे पर्वत की चोटी पर सुबह का न्योता है भोर होने वाली है अब मुझे चलना है सुबह की पहली किरण के साथ सूरज से मुझे मिलना है
~ राहुल सिंह










