आचार्य गर्ग ऋषि जो की भगवान् कृष्ण के ही समकालीन थे और भगवान कृष्ण के कुल वृषणी वंश के यादवों के कुलगुरु भी थे। इन्ही आचार्य गर्ग ने भगवान कृष्ण और उनके भाई बलराम का नामकरण किया था।
आचार्य गर्ग द्वार रचित गर्ग संहिता ने सर्व प्रथम राधा का वर्णन किया गया। गर्ग ऋषि के विचारानुसार राधा मात्र कृष्ण की प्रेमिका नहीं अपितु उनका ही अनान्द रूप और उनकी भक्त भी है। राधा शब्द की उत्पत्ति धारा शब्द से हुई है। जिस प्रकार नदी अपने उद्गम से दूर हो धारा बन जाती है उसी प्रकार से भक्त अपने भगवान से दूर हो धारा बन जाता है। किन्तु जो नदी अपनी उद्गम में लौट आये वो राधा होती ही ठीक वैसे ही जो भक्त अपने भगवान में स्वयं को विलीन कर ले तो वो राधा बन जाता है।
राधा अपने अस्तित्व से ऊपर उठ अपने कृष्ण में जा मिली तभी वो धारा से राधा बनी।
क्यों राधा का नाम श्रीमद्धभागवत पुराण में नहीं?
लोकों में यह बात प्रचलित है कि यदि राधा कृष्ण के इतने ही सन्मुख थी तो उनका वर्णन श्रीमद्धभगवत पुराण में क्यों नहीं है।
कुछ विद्वानों का मानना है कि जब सुकदेव जी द्वारा श्रीमद्धभगवत पुराण की रचना हो रही थी और जब वो इसका उपदेश पांडवो के पौत्र परीक्षित को कर रहे थे तब यदि उनके मुख से राधा शब्द के निकलते ही उनको मोक्ष प्राप्त हो जाता और श्रीमद्धभगवत का उपदेश भी अधूरा रह जाता इसलिए सुकदेव जी ने यथासंभव राधा शब्द को कृष्ण से दूर रखा जिससे की उन्हें मोक्ष ना मिले और वो निर्विघ्न ही श्रीमद्धभगवत पुराण का उपदेश कर सके।
राधा का वर्णन कृष्ण के साथ होने का विवरण ब्रह्मववर्त्य पुराण में भी है। इसके अनुसार कृष्ण गौलोक के स्वामी है और राधा गौलोक की स्वामिनी। गौलोक में राधा कृष्ण के संग उनकी संगिनी के रूप में ही विराजती है।
तभी तो कृष्ण का नाम रहता है आधा , जब तक ना हो उसमे राधा।