इसे अभी संवरना है
धूल के ग़ुबार उड़ रहे थे हज़ारों अश्व दौड़ रहे थे लगता है आक्रमणकारी आया है पश्चिम से एक बार फिर अपनी सेना लाया है
यह आक्रमणकारी बार बार क्यों आता है ये पश्चिम से ही क्यों आता है रेगिस्तान को ही क्यों भुगतना पड़ता है मेरे इन रेत के कणों को ही क्यों तपना पड़ता है
राजपूत किलों में बैठ कर दुश्मन का इंतजार नहीं करता था निकल पड़ता था अपने रणबांकुरों के साथ भीड़ जाता था इन विदेशियों से हर बार ऐसा करते करते निकल गये साल हज़ार
मेरी धरती मेरी रेत का एक एक कण पवित्र है, सोना है पूरी चमक के साथ जीती है मैंने हर जंग देश की और हर बार दुश्मन आया है मेरे हाथ
न देखना ख़्वाब में भी इसे, जल जाएगी तेरी आंखें रेगिस्तान का एक एक कण मेरा अपना है मेरी धरती के श्रृंगार का रंग लाल है न आना इस ओर, इसे अभी संवरना है
~ राहुल सिंह












