फिर...सवेरा ज़रूर होगा ।।
फिर बैठेंगे ऐसे ही,
चाय की टपरी पर चार दोस्त,
जब ना होगा कल का ख़ौफ़,
आज का डर,
और ना आने वाले कल की चिंता ।।
फिर गुज़रेंगे ऐसे ही,
तेरी तंग गलियों से,
बनकर बेफ़िक्र बंजारे,
इक निगाह की तलाश में,
बेपरवाह हवाओं की तरह,
जो हर जगह से गुजर जाती हैं ।।
फिर हँसेंगे ऐसे ही,
बिना बात के,
और अचानक से लग जाएँगे गले,
भीगो देंगे दामन तेरा,
अपने गिले,शिकवों के अश्क़ों से ।।
फिर निकलेंगे घर से,
अनजाने रास्तों पर,
सफ़र की खोज में,
बंधनों से मुक्त,
आँखों में कल के ख़्वाब लिए।।
फिर सन्नाटा हारेगा,
गलियों में शोर होगा,
इन तनहाइयों का कोई तो छोर होगा,
हरा सके जो इंसानियत को किसमें इतना ज़ोर होगा,
रात लम्बी है ये सच है,
मगर सवेरा ज़रूर होगा।।
~mesmerizing-words

















