अन्त में कहूंगा सिर्फ इतना कहूँगा हां हां मैं कवि हूं, कवि-याने भाषा में भदेस हूँ इस कदर कायर हूँ कि उत्तरप्रदेश हूँ।
धूमिल
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अन्त में कहूंगा सिर्फ इतना कहूँगा हां हां मैं कवि हूं, कवि-याने भाषा में भदेस हूँ इस कदर कायर हूँ कि उत्तरप्रदेश हूँ।
धूमिल
कर्फ्यू में एक घन्टे की छूट / धूमिल
मैं चिड़ियाघर से वापस आ रहा था
और तुम लौट रहे थे खेल के मैदान से
जब मैंने अपने छोटे भाई के गायब होने की खबर
तुम्हें दी l
हम कि जो प्यारे दोस्त थे l
घबराने की कोई बात नहीं l
गोलीकान्ड के बाद
लड़कों का गायब होना नई बात नहीं है
यह शान्ति का मसला है
लेकिन खबरों के मलबों के नीचे
सच्चाई का पता कब चला है ?
घबराने की कोई बात नहीं और
यह खतरनाक भी नहीं
जितना किसी लडकी का पीछा करना l
देह के जलाशय में
तैरना न जानते हुए भी
कूल्हों के कशर कूद, भरना l
आखिरकार लड़का अन्तिम बार
कहाँ देखा गया l
संसद की ओर जाने वाली सड़क पर
हरी कमीज़ पहने हुए,
और यह अच्छी बात है कि
उसने लाल स्कार्फ को
झण्डे की तरह तान लिया था
जिसे सुबह उसने पीछा करके
पड़ोस की लड़की से छीना था
यौवन ऐसा सिक्का है
जिसके एक ओर प्यार
और दूसरी तरफ गुस्सा छापा है l
कम-से-कम यह एक सबूत है
उसके जिन्दा रहने का
कि वह 'लोकसभा-भवन' की ओर जा रहा था l
महज लाल स्कार्फ के साथ
जिसे उसने झण्डे की तरह उठा रखा था l
और अभी उसके
अपने 'मतदान' के खिलाफ
होने का सवाल ही उठता नहीं था
क्योंकि वह एक साथ चुन लेना चाहता है -
तितलियाँ, स्कार्फ, होंठ और फूलों
के जादुई रंग l
पेट और प्रजातन्त्र के बीच का सम्बन्ध
उसके पाठ्यक्रम में नहीं है l
वह एक दुधमुँही दिलचस्पी है
कुलबुल जिज्ञासा है
जिसे मारने के लिए इस पृथ्वी पर
अभी कोई गोली नहीं बनी l
(घनी-घनी उसकी बरौनियों के बीच की
हवापट्टी पर दिवास्वप्नों की गूँजें
उतरती हैं l )
और कर्फ्यू में शान्त ठण्डी सड़क पर
सैनिक दस्तों के जूतों से
कितनी सफेद और मार्मिक ध्वनि
निकल रही है ...
जनतन्त्र...जनतन्त्र...जनतन्त्र...जनतन्त्र
एकान्त-कथा / धूमिल
मेरे पास उत्तेजित होने के लिए कुछ भी नहीं है न कोकशास्त्र की किताबें न युद्ध की बात न गद्देदार बिस्तर न टाँगें, न रात चाँदनी कुछ भी नहीं बलात्कार के बाद की आत्मीयता मुझे शोक से भर गयी है मेरी शालीनता – मेरी ज़रूरत है जो अक्सर मुझे नंगा कर गयी है जब कभी जहाँ कहीं जाता हूँ अचूक उद्दण्डता के साथ देहों को छायाओं की ओर सरकते हुए पाता हूँ भट्ठियाँ सब जगह हैं सभी जगह लोग सेकते हैं शील उम्र की रपटती ढलानों पर ठोकते हैं जगह-जगह कील – कि अनुभव ठहर सकें अक्सर लोग आपस में बुनते हैं गहरा तनाव वह शायद इसलिए कि थोड़ी देर ही सही मृत्यु से उबर सकें मेरी दृष्टि जब भी कभी ज़िन्दगी के काले कोनों मे पड़ी है मैंने वहाँ देखी है – एक अन्धी ढलान बैलगाड़ियों को पीठ पर लादकर खड़ी है (जिनमें व्यक्तित्व के सूखे कंकाल हैं) वैसे यह सच है – जब सड़कों मे होता हूँ बहसों में होता हूँ; रह-रह चहकता हूँ लेकिन हर बार वापस घर लौटकर कमरे के अपने एकान्त में जूते से निकाले गए पाँव-सा महकता हूँ।
हर तरफ धुआं है / धूमिल
हर तरफ धुआं है हर तरफ कुहासा है जो दांतों और दलदलों का दलाल है वही देशभक्त है अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है- तटस्थता। यहां कायरता के चेहरे पर सबसे ज्यादा रक्त है। जिसके पास थाली है हर भूखा आदमी उसके लिए, सबसे भद्दी गाली है हर तरफ कुआं है हर तरफ खाईं है यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है जो या तो मूर्ख है या फिर गरीब है
सिलसिला / धूमिल
हवा गरम है और धमाका एक हलकी-सी रगड़ का इंतज़ार कर रहा है कठुआये हुए चेहरों की रौनक वापस लाने के लिए उठो और हरियाली पर हमला करो जड़ों से कहो कि अंधेरे में बेहिसाब दौड़ने के बजाय पेड़ों की तरफदारी के लिए ज़मीन से बाहर निकल पड़े बिना इस डर के कि जंगल सूख जाएगा यह सही है कि नारों को नयी शाख नहीं मिलेगी और न आरा मशीन को नींद की फुरसत लेकिन यह तुम्हारे हक में हैं इससे इतना तो होगा ही कि रुखानी की मामूली-सी गवाही पर तुम दरवाज़े को अपना दरवाज़ा और मेज़ को अपनी मेज कह सकोगे।
कुछ सूचनाएं / धूमिल
सबसे अधिक हत्याएँ
समन्वयवादियों ने की
दार्शनिकों ने
सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा
भीड़ ने कल बहुत पीटा
उस आदमी को
जिस का मुख ईसा से मिलता था
वह कोई और महीना था
जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था
किंतु इस बार तो
मौसम बिना बरसे ही चला गया
न कहीं घटा घिरी
न बूँद गिरी
फिर भी लोगों में टी.बी. के कीटाणु
कई प्रतिशत बढ़ गए
कई बौखलाए हुए मेंढक
कुएँ की काई लगी दीवाल पर
चढ़ गए
और सूरज को धिक्कारने लगे
— व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है
सूरज कितना मजबूर है
कि हर चीज़ पर एक सा चमकता है
हवा बुदबुदाती है
बात कई पर्तों से आती है —
एक बहुत बारीक पीला कीड़ा
आकाश छू रहा था
और युवक मीठे जुलाब की गोलियाँ खा कर
शौचालयों के सामने
पँक्तिबद्ध खड़े हैं
आँखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं
लोग खोई हुई आवाज़ों में
एक दूसरे की सेहत पूछते हैं
और बेहद डर गए हैं
सब के सब
रोशनी की आँच से
कुछ ऐसे बचते हैं
कि सूरज को पानी से
रचते हैं
बुद्ध की आँख से खून चू रहा था
नगर के मुख्य चौरस्ते पर
शोकप्रस्ताव पारित हुए
हिजड़ो ने भाषण दिए
लिंग-बोध पर
वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं
आत्म-शोध पर
प्रेम में असफल छात्राएँ
अध्यापिकाएँ बन गई हैं
और रिटायर्ड बूढ़े
सर्वोदयी —
आदमी की सबसे अच्छी नस्ल
युद्धों में नष्ट हो गई
देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य
विद्यालयों में
संक्रामक रोगों से ग्रस्त है
(मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को
सड़को पर
किश्तियों की खोज में
भटकते हुए देखा है)
संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ
भीतर ही भीतर
एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है
पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ
प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं
सबसे अच्छे मस्तिष्क
आरामकुर्सी पर
चित्त पड़े हैं ।
दिनचर्या / धूमिल
सुबह जब अंधकार कहीं नहीं होगा,
हम बुझी हुई बत्तियों को
इकट्ठा करेंगे और
आपस में बाँट लेंगे.
दुपहर जब कहीं बर्फ नहीं होगी
और न झड़ती हुई पत्तियाँ
आकाश नीला और स्वच्छ होगा
नगर क्रेन के पट्टे में झूलता हुआ
हम मोड़ पर मिलेंगे और
एक दूसरे से ईर्ष्या करेंगे.
रात जब युद्ध एक गीत पंक्ति की तरह
प्रिय होगा हम वायलिन को
रोते हुए सुनेंगे
अपने टूटे संबंधों पर सोचेंगे
दुःखी होंगे
कविता के द्वारा हस्त्तक्षेप / धूमिल
जब मै अपनें ही जैसे किसी आदमी से बात करता हूँ, साक्षर है पर समझदार नहीं है । समझ है लेकिन साहस नहीं है । वह अपने खिलाफ चलाने वाली साजिश का विरोध खुल कर नही कर पाता । और इस कमजोरी को मैं जानता हूँ । लेकिन इसलिये वह आम मामूली आदमी मेरा साधन नहीं है यह मेरे अनुभव का सहभागी है, बनता है ।
जब मैं उसे भूख और नफ़रत और प्यार और ज़िंदगी का मतलब समझाता हूँ-और मुझे कविता में आसानी होती है-जब मैं ठहरे हुए को हरकत में लाता हूँ -एक उदासी टूटती है,ठंडापन ख़त्म होता है और वह ज़िंदगी के ताप से भर जाता है ।
मेरे शब्द उसे ज़िंदगी के कई-स्तरों पर खुद को पुनरीक्षण का अवसर देते हैं, वह बीते हुये वर्षों को एक- एक कर खोलता है । वर्तमान को और पारदर्शी पाता है उसके आर-पार देखता है । और इस तरह अकेला आदमी भी अनेक कालों और अनेक संबंधों मे एक समूह मे बदल जाता है । मेरी कविता इस तरह अकेले को सामूहिकता देती है और समूह को साहसिकता ।
इस तरह कविता में शब्दों के ज़रिये एक कवि अपने वर्ग के आदमी को समूह की साहसिकता से भरता है जब कि शस्त्र अपने वर्ग-शत्रु को समूह से विच्छिन्न करता है । यह ध्यान रहे कि शब्द और शस्त्र के व्यवहार का व्याकरण अलग-अलग है शब्द अपने वर्ग-मित्रों में कारगर होते हैं और शस्त्र अपने वर्ग-शत्रु पर ।