26 नवंबर से शुरू हुआ किसान आंदोलन घात का शिकार होगा या विश्वासघात का?
"आंदोलन आगे भी ले जाते हैं, पीछे भी। ऊपर भी ले जाते हैं, नीचे भी। मौजूदा आंदोलन केवल किसानों का आंदोलन नहीं है, इस मुल्क के मुस्तकबिल को तय करने का आंदोलन है। अब खतरा इस बात का है कि इसे किसानों की एक अदद मांग तक लाकर न पटक दिया जाय। मान लीजिए कि कल को सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की लिखित गारंटी देने को तैयार हो जाय और योगेंद्र यादव सहित उनके तमाम समाजवादी हितैशियों ने पंजाब के किसानों को दबाव में लेकर इसे स्वीकार करने को राज़ी कर लिया, तब? आप कितने साल बाद उम्मीद करते हैं कि किसानों का जत्था दोबारा राशन पानी लेकर दिल्ली आएगा?"
Abhishek Srivastava की कलम से पिछले सात दिनों की मुकम्मल कहानी और ऊपर मंडराते खतरों का जायज़ा











