धारा 24 | संस्वीकृति क्या है | परिभाषा एंव इसके प्रकार | स्वीकृति एवं संस्वीकृति में अन्तर
संस्वीकृति क्या है? (What is Confession) - साक्ष्य विधि में संस्वीकृति (Confession) का उतना ही महत्त्व है जितना स्वीकृति का है। आपराधिक मामलों में संस्वीकृति से सही निष्कर्ष पर पहुँचना तथा मामले का त्वरित विचारण आसान हो जाता है| संस्वीकृति का मौलिक कानून साक्ष्य अधिनियम की धारा 24 से धारा 30 एंव दण्ड प्रक्रिया संहिता में प्रक्रिया विधि में धारा 164, 281 व 463 में दिया गया है| स्टीफेन के अनुसार - “संस्वीकृति (Confession) एक ऐसी स्वीकृति है जो किसी भी समय ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है जिस पर किसी अपराध का आरोप है और जो यह स्वीकार करता है या उसके कथन से यह अनुमान होता है कि उसने अपराध किया है।” संस्वीकृति की परिभाषा (Definition of Confession) – यद्यपि साक्ष्य अधिनियम में इसकी स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है फिर भी संस्वीकृति से सम्बंधित जितने उपबंध है वह स्वीकृति शीर्षक के अन्तर्गत दिए गए है| धारा 17 में दी गई स्वीकृति की परिभाषा संस्वीकृति पर भी लागु होती है| संस्वीकृति से तात्पर्य – अभियुक्त द्वारा ऐसा कथन किया जाना जिसमे वह स्वंय किसी अपराध को करने या उस अपराध के गठन में भूमिका होना स्वीकार करता है, संस्वीकृति कहलाती है| भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 24 के अनुसार - “अभियुक्त व्यक्ति द्वारा की गई संस्वीकृति दाण्डिक कार्यवाही में विसंगत होती है, यदि उसके किये जाने के बारे में न्यायालय को प्रतीत होता हो कि अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध आरोप के बारे में वह ऐसी उत्प्रेरणा, धमकी या वचन द्वारा कराई गई है जो प्राधिकारवान व्यक्ति की ओर से दिया गया है और जो न्यायालय की राय में इसके लिए पर्याप्त हो कि वह अभियुक्त व्यक्ति को यह अनुमान करने के लिए उसे युक्तियुक्त प्रतीत होने वाले आधार देती है कि उसके करने से वह अपने विरुद्ध कार्यवाहियों के बारे में ऐहिक रूप का कोई फायदा उठायेगा या ऐहिक रूप से किसी बुराई का परिवर्जन कर लेगा।" संस्वीकृति के लिए निम्नांकित बातों का होना आवश्यक है - (क) यह ऐसे व्यक्ति द्वारा की गई हो जिस पर किसी अपराध का आरोप हो, (ख) उसके द्वारा अपराध को या अपराध गठित करने वाले तथ्यों को स्वीकार कर लिया गया हो, (ग) यह स्वैच्छिक रूप से की गई हो इसमें किसी प्रकार से उत्प्रेरणा, धमकी या वचन नहीं होना चाहिए जैसा की अधिनियम की धारा 24 में कहा गया है| ए व्यक्ति पर बी व्यक्ति को डुबो कर उसकी हत्या करने का आरोप है। यदि ए कहता है कि उसने बी को डुबो दिया है, तब वह एक संस्वीकृति है, लेकिन यदि ए कहता है कि मैं तथा बी नदी में स्नान कर रहे थे, उस वक्त सी व्यक्ति आया और बी को डुबोने लगा। मैंने, बी को बचाने की कोशिश की, परन्तु बचा नहीं सका, तब यह केवल स्वीकृति है, Confession नहीं है। संस्वीकृति के प्रकार (Type of Confession) - (i) न्यायिक संस्वीकृति (Judicial Confession) - न्यायिक संस्वीकृतियां वे है जो किसी अभियुक्त द्वारा एक मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष विधिक कार्यवाही के दौरान की जाती है और इनका धारा 164, 281, 313 व दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 के तहत लेखबद्ध किया जाना आवश्यक है| साक्ष्य अधिनियम की धारा 80 ऐसी लेखबद्ध की गई संस्वीकृति के हक़ में उपधारणा कर लेती है कि यह विधि अनुसार ली गई है|(ii) न्यायेत्तर संस्वीकृति (Extra judicial confession) – न्यायेत्तर Confession से तात्पर्य अभियुक्त द्वारा मजिस्ट्रेट के सामने या न्यायालय से बाहर किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के समक्ष किये गए कथन से है| अकेले में बड़बड़ाना भी न्यायेत्तर संस्वीकृति हो सकती है तथा यह एक प्रार्थना के रूप में भी हो सकता है|स्वीकृति एवं संस्वीकृति में मुख्य अन्तर (Difference between Acceptance and Confession) – (i) स्वीकृति एक जाति है, जबकि Confession उसकी उपजाति है। (ii) स्वीकृति का प्रयोग सामान्यतः सिविल मामलों में किया जाता है, जबकि Confession का प्रयोग आपराधिक मामलों में किया जा सकता है। (iii) स्वीकृति वाद के पक्षकार, अभिकर्त्ता, हितबद्ध व्यक्ति या प्रतिनिधि द्वारा की जा सकती है, जबकि यह केवल अभियुक्त द्वारा ही की जा सकती है। (iv) स्वीकृति का प्रयोग उसे करने वाले के पक्ष में किया जा सकता है, जबकि Confession का प्रयोग उसे करने वाले के विरुद्ध किया जाता है। Read More - भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत संस्वीकृति क्या है? Read the full article

















