"अब्बा जान! आपने मेरा नाम आरज़ू क्यों रखा?" एक नन्हीं सी बच्ची ने अपने अब्बा आसिफ से कहा! सफ़ेद दाढ़ी के बीच से हलकी सी मुस्कान लाते हुए आसिफ बोला, "तुम्हें उपरवाले से बड़ी मन्नतों और दुआओं के बाद पाया है, क्यूंकि मेरी ज़िन्दगी की आरज़ू तुम्हीं थीं, इसलिए तुम्हारा नाम भी मैंने आरज़ू रख दिया!"। ये बात सुनकर आरज़ू ने आसिफ की तरफ मुस्कुराकर देखा और जाकर बाहर खेलने लगी!
आसिफ वयोवृद्ध न था मगर उम्र का दौर भी चालीस की कतार की आखिरी पायदान के आसपास था और बीवी का इंतेक़ाल हुए करीबन ५ साल हो गए थे! जब मेहरुनिस्सा, हमारे आसिफ साहब की शरीक-ऐ-हयात, का इंतेक़ाल हुआ तब आरज़ू की उम्र करीबन ३ साल की थी और आज आरज़ू उन ग़मों को भूलकर अपने पिता के साथ जीती हुई एक मासूम सी बच्ची थी! हर बाप की तरह आसिफ की नज़र का तारा ही थी आरज़ू!
आसिफ ने कभी पाकिस्तान की सेना को अपनी सेवाएं दी थीं परन्तु बेटी के पालन-पोषण के लिए उसने सेना छोड़ी और पास ही के गांव में बस गया था! आरज़ू को थोड़ा तालीम दिलवाने के लिए स्कूल भेजा करता था.।! ऐसा था आसिफ! "अब्बु! आज स्कूल नहीं जाना है! बहुत पेट दर्द हो है!" आरज़ू ने भोलेपन से आँख मटकाते हुए कहा, जिस से आसिफ समझ गया कि आज आरज़ू बिटिया बहाना कर रही है स्कूल न जाने के लिए! "आरज़ू! अच्छा अगर तुम आज तुम स्कूल हैं तो दोपहर के खाने में तुम्हारे लिए खजूर की सेवईं बनाकर लाऊंगा और शाम को सालन खिलवाऊंगा मगर ये सब मिलेगा अगर तुम स्कूल जाओगी!" जब आसिफ ने ये कहा तो अनमने भाव से आरज़ू खड़ी हुई और स्कूल के कपडे पहनकर चल दी और जाते-जाते हाथ हिलाकर अलविदा कहने का हक़ अदा किया!
कहीं दूर एक धमाके की आवाज़ से पूरा गाँव हिल गया!
आसिफ ज़ार-ज़ार रो रहा था क्यूंकि उसके सामने विद्रित शव पड़ा था आरज़ू का..... और आरिफ को पता था कि इन विस्फोटों में सेना का भी कही न कहीं हाथ था!!!
"अभी अभी खबर मिली है कि एक अनजान दहशतगर्द ने फौजी स्कूल के बच्चों पर गोलियां चला दी हैं और अब तक कई बच्चे अंदर फंसे हुए हैं और कई बच्चे अपनी जान भी गँवा चुके हैं!" जैसे ही बुद्धुबक्से पर ये खबर पहुंची, पूरे कस्बे में हंगामा मच गया!
"अभी-अभी ख़बर मिली है की दहशतगर्द को मार गिराया गया है और पुलिस को उसके पास से एक खत मिला है जिसमे उसने सेना को उसकी बेटी आरज़ू की मौत का ज़िम्मेदार ठहराया है! मरनेवाले का नाम आसिफ था और उसके इस हमले में २१ बच्चों के हलाक होने की खबर है!"
अपनी एक आरज़ू के लिए इतनी आरज़ूओं को मिटाना क्या सही बात थी? आप सोचिये और बताइये!!