मानवता धर्म से भिन्न नहीं धर्म का अभिन्न अंग है
मानवता धर्म से भिन्न नहीं धर्म का अभिन्न अंग है
मानवता धर्म से भिन्न नहीं धर्म का अभिन्न अंग है धर्म
धर्म एक व्यापक शब्द है जिसके लिये कहा गया है-‘धारयति इति धर्म:’ अर्थात जिसे धारण किया जाये उसे धर्म कहते हैं । अब सवाल उठता है इसे कहां और कैसे धारण किया जाये । धर्म का धारण करने का स्थान अंत:करण है । इसे अंत:करण में धारण किया जाता है । विचारों को व्यवहारिक रूप से जिया जाता है । धर्म कोई पूजा की वस्तु न होकर जीवन जीने की शैली…
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