"MBA की डिग्री थामे, किराने की दुकान का खयाल – औरों की नज़रों में शर्म, खुद की नज़रों में सवाल!"
“बाबू साहब का लड़का MBA करके अब किराने की दुकान चला रहा है।” गांव में किसी के कानों में ये बात पड़ जाए, तो जैसे किसी ने चूल्हे में पानी डाल दिया हो।
कभी-कभी सोचता हूं कि कोई बिज़नेस शुरू करूं। किराने की दुकान, कपड़ों की दुकान, कुछ तो ऐसा जिसमें अपना मालिक मैं खुद बनूं। फिर सोचता हूं, लोग क्या कहेंगे? गांव वाले, रिश्तेदार, यहां तक कि अपने घर वाले भी।
MBA किया है, शहर में नौकरी की, और अब गांव आकर दुकान खोल रहा है? क्या फायदा ऐसे पढ़-लिखने का? बिना डिग्री वाला तो पहले से ही यही कर रहा है...
लेकिन कोई ये क्यों नहीं सोचता कि — नौकरी में दम घुटता है। हर दिन अंदर ही अंदर टूटते हैं हम। एक मुस्कान ओढ़े, दिन भर खड़े रहते हैं, और रात को चुपचाप रोते हैं।
घरवालों को बताने जाओ तो कहते हैं — "जैसा चल रहा है, चलने दो। ज्यादा सोचो मत।" अब उनसे कैसे कहूं कि नौकरी अब सिर्फ एक मजबूरी बन गई है। ना मन लग रहा, ना शरीर साथ दे रहा, और ना ही आत्मा ये सब स्वीकार कर रही है।
कभी लगता है सब छोड़कर, कुछ खुद का शुरू करूं। कुछ छोटा, लेकिन इज्ज़त वाला, अपना वाला, सुकून वाला। पर डर लगता है... डिग्री की बेइज़्ज़ती का, सपनों की हत्या का, और अपनों की बेरुखी का।
सवाल ये नहीं कि मैं क्या कर रहा हूं। सवाल ये है कि जो कर रहा हूं, क्या वो मुझे ज़िंदा रहने दे रहा है?
शायद कोई नहीं समझेगा, शायद हंसेंगे, शायद ताने मारेंगे...
लेकिन एक दिन जब मैं अपने ही बनाए सपनों की दुकान पर पहला ग्राहक देखूंगा,तो सारा ताना, सारी शर्म, और हर ठहाका पीछे छूट जाएगा।















