भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 50 भावार्थ : समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है॥50॥ जीवात्मा अनादि काल से अपने अच्छे तथा बुरे कर्म के फलों को संचित करता रहा है। फलतः वह निरन्तर अपने स्वरूप से अनभिज्ञ बना रहा है। इस अज्ञान को भगवद्गीता के उपदेश से दूर किया जा सकता है। यह हमें पूर्ण रूप में भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में जाने तथा जन्म-जन्मान्तर कर्म-फल की शृंखला का शिकार बनने से मुक्त होने का उपदेश देती है, अतः अर्जुन को कृष्णभावनामृत में कार्य करने के लिए कहा गया है क्योंकि कर्मफल के शुद्ध होने की यही प्रक्रिया है। यह भगवत गीता सीरीज का अंग है आप पहले के श्लोक मेरी पिछली पोस्ट में जाकर देख सकते हैं, और आगे के भाग के लिए कृपया मेरे साथ बने रहे । . . #radheradhe🙏 #gaurgopaldas #spreadlove #spritualjourney #sprituallife #spritualgrowth #sprituallifecoach #spritiualawakening #wordgasm #wordsofwisdom #gitashlokas #gitainhindi #gitaasitis #bhagwadgeetachanting #quotes #shlokchanting #sanskritshloka #sanskritquotes #motivationalwords #motivationalreels #motivationoftheday (at Hare Rama Hare Krishna) https://www.instagram.com/p/CLYp16UFmcx/?igshid=ewb9ptqbnw79










