पल जो अनंत बन गया
“वो रात, जब समय रुक गया”रात की खामोशी में चाँदनी ऐसे बिखरी थी, जैसे आकाश ने अपनी उजली चादर हमारे कमरे पर ओढ़ा दी हो। बाहर दूर कहीं झींगुर अपनी धीमी तान छेड़ रहे थे, और हवा खिड़की से फिसलते हुए अंदर आकर हमारे चारों ओर लहराते परदों को अपने संग नचा रही थी।उस वातावरण में, जैसे हर वस्तु हमारी कहानी सुनने के लिए ठहर गई हो।हम दोनों एक-दूसरे के सामने बैठे थे। हमारी आँखें जैसे दो दीपक की लौ — अलग-अलग…












