मेरे अंदर भी इक रावण है
काम क्रोध मद लोभ लिए
मुझमे भी देखो दस सिर हैं
क्या बोलूं मैं उस रावण को
मुझमें भी इक रावण है
अहंकार की ज्वाला में
देखो मैं तिल तिल जलता हूँ
काम भरी आँखों से देखो
सीता हरण मैं करता हूँ
लोभ लिए इस मस्तक में
देखो षडयंत्र मैं रचता हूँ
जो हँसते हो मेरे ऊपर
तुम सब में भी एक रावण है
ईर्ष्या की भीषण अग्नि से
जो रोज तुम्हे जलाता है
तेरे लाख जतन पर भी
वो रोज तुम्हें हराता है
इक सच से तुम्हें मिलाता हूँ
इक राज तुम्हें बतलाता हूँ
मेरे अंदर इक राम भी है
जो रावण से मुझे मिलाता है
रावण के हावी होने पर
राम उसे हराता है
जब रावण तेरा दिखा नहीं
राम कहाँ दिख पायेगा
रावण ऐसा हावी हो कि
फिर कभी नहीं मिट पाएगा
जिनके अंदर राम नहीं
उनपे हो न उपकार कोई
वो रावण पर यूँ हँस ले
उनको इतना अधिकार नहीं
(अनुभव 'अनंत')















