✴️कौन है अविनाशी परमात्मा ?✴️
अविनाशी का अर्थ है अजरों अमर, जिसका कभी नाश ना हो, परमात्मा को अजन्मा, अजर-अमर कहते हैं। अज्ञानता वश हिन्दू धर्म में श्री ब्रह्मा श्री विष्णु तथा श्री शंकर जी को विशेषकर अविनाशी प्रभू माना जाता है। लेकिन श्रीमद् देवी भागवत पुराण तीसरा स्कंध अध्याय 5 पेज 123 पर स्पष्ट प्रमाण है की तीनों गुण रजोगुण ब्रह्मा जी, सतोगुण विष्णु जी, तमगुण शिवजी ब्रह्म (काल) तथा प्रकृति (दुर्गा) से उत्पन्न हुऐ है तथा यह तीनो प्रभु नाशवान है।
गीता जी श्लोक 15.16-15.17 में भी पूर्ण वर्णन किया गया है की जो इन तीन देवों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) की भक्ति करते हैं उनकी मुक्ति कभी नहीं हो सकती। हे नादान प्राणियों इनकी उपासना में मत भटको। पूर्ण परमात्मा की साधना करो।
हमारे सभी धार्मिक ग्रन्थों व शास्त्रों में उस एक प्रभु/मालिक/रब/खुदा/अल्लाह/ राम/साहेब/गोड/परमेश्वर की प्रत्यक्ष नाम लिख कर महिमा गाई है कि वह एक मालिक/प्रभु कबीर साहेब है जो सतलोक में मानव सदृश स्वरूप में आकार में रहता है वही अविनाशी परमेश्वर है, हम सभी आत्माओं का जनक है।
तत्वज्ञान के अभाव से श्रद्धालु शंका व्यक्त करते हैं कि जुलाहे रूप में कबीर जी तो वि. सं. 1455 (सन् 1398) में काशी में आए हैं। वेदों में कविर्देव यही काशी वाला जुलाहा (धाणक) कैसे पूर्ण परमात्मा हो सकता है?
इसका उत्तर यह है की पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर परमेश्वर) वेदों के ज्ञान से भी पूर्व सतलोक में विद्यमान थे तथा अपना वास्तविक ज्ञान (तत्वज्ञान) देने के लिए चारों युगों में भी स्वयं प्रकट हुए हैं। सतयुग में सतसुकृत नाम से, त्रेतायुग में मुनिन्द्र नाम से, द्वापर युग में करूणामय नाम से तथा कलयुग में वास्तविक कविर्देव (कबीर प्रभु) नाम से प्रकट हुए हैं। इसके अतिरिक्त अन्य रूप धारण करके कभी भी प्रकट होकर अपनी लीला करके अन्तध्र्यान हो जाते हैं।
जिन जिन पुण्यात्माओं ने परमात्मा के साक्षात्कार किये है उन्होंने बताया है की वास्तव में परमात्मा आकार में है। मनुष्य सदृश शरीर युक्त हैं। परंतु परमेश्वर का शरीर नाडि़यों के योग से बना पांच तत्व का नहीं है। एक नूर तत्व से बना है। पूर्ण परमात्मा जब चाहे यहाँ प्रकट हो जाते हैं वे कभी मां से जन्म नहीं लेते क्योंकि वे सर्व के उत्पत्ति करता हैं। (प्रमाण यजुर्वेद अध्याय 29 मन्त्र 25, ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 96 मन्त्र 17, 18 आदि)
कलयुग में भी कबीर परमेश्वर ज्येष्ठ मास की शुक्ल पूर्णमासी विक्रमी संवत 1455 सन् 1398 ब्रह्म मुहूर्त मैं कशी शहर के लहरतारा सरोवर मैं कमल के फूल पर एक नवजात शिशु का रूप धारण करके प्रकट हुए थे ।
कबीर परमेश्वर 120 वर्ष तक रहे और कविताओं व् लोकोक्तियों द्वारा अपने तत्वज्ञान का प्रचार किया था।
मात-पिता मेरे घर नहीं, ना मेरे घर दासी।
तारण -तरण अभय पद दाता, हूँ कबीर अविनाशी ।।
इससे सिद्ध है की वास्तविक परमेश्वर सिर्फ कबीर जी है।
संत रामपाल जी महाराज बताते हैं, शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि अब हम अपना भगवान पहचान सकते हैं। अब हम खुद शास्त्र पढ़ कर यह देख सकते हैं कि हमारे पवित्र सदग्रंथों में क्या लिखा है। ज़रूर Visit करें "Satlok Ashram” यूट्यूब चैनल।
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