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वो कौन चल पड़ा समर मे बिना तीर कमान,
लिए मयूर पंख हाथ मे, लिए कंठ वेद ज्ञान,
वो शांत लहरों का माँझी क्यों बढ़ चला भँवर को,
वो चमन का मुसाफिर क्यूँ अग्रसर है वन को,
क्या भ्रम है उसे अपने अहम जड़े ज्ञान मे,
ये ज्ञात नही उसको, सब सरल नही संसार मे।
जो धूप कभी उसे अलसाई सी लगती थी,
और बारिश ईश की परछाई सी लगती थी,
चाँद तारे रजनी के शृंगार प्रतीत होते थे,
और खगों की बोली शहनाई से होते थे,
वो मेहंदी युवतियों के सौन्दर्य निखारा करती है,
प्रेम उसे राधा-कृष्ण की ही याद दिलाया करती है।
और ये भ्रम का धुंध अब छटने लगा,
सभी चेहरों का नकाब जैसे हटने लगा,
शासवत, अद्भुत, निखिल प्रभुत्ब का,
नशा मानो फटने लगा।
वो दिनमणि की किरणे ताप बढ़ाती जाती है,
और फिर छोड़ आकाश को जलमग्न हो जाती है,
वो बारिश जब आक्रोश दिखाती है,
मानो इक प्रलय ही मच जाती है,
वो निशा का काजल भी गहराता सा जाता है,
चाँद घटते घटते इक रोज छुप जाता है,
कागों की आवाज़ वेदना दे जाती है,
मनमोहक मयूर भी भक्षक बन जाती है,
वो मेहंदी का सुर्ख रंग जल्द पड़ा फीका,
और फिर कुछ का दूषित हृदय भी दिखा,
वो प्रेम का रिश्ता आंशुओं सा लगता है,
वो मिथ्या देशप्रेम शोणितपथ से गुज़रता है।
वो हैरत है ये देखकर, और थोड़ा सहमा भी,
वो हाथ काँपती लिखने से, और स्याह भी फ़ीकी,
वो था मुझ सा तो मैंने राह दिखाया,
थोड़ा संतावित किया, फिर निहित रहस्य बतलाया,
वो आज भी किसी डिब्बे मे बैठा सिसक रहा होगा,
मैं हवा मे हाथ हिला कर लौट आया। ।
-रोहित kumar













