मैं, मैं नहीं हूँ।
रेशा रेशा
पानी पानी
धुआँ धुआँ
हवा हवा
मैं, मैं नहीं हूँ
ख़्वाब हूँ
जो सबके होते हैं
अधूरे, पूरे, उधारी के
रात के, दिन के, पहरेदारी के
उलझा हुआ कोई तारा हूँ
जिसके चाँद की ख़बर नहीं कोई
वो खो गया है
ज़मीन पर बिखरी हज़ार
चांदी की थालियों के दरमियाँ कहीं
रेत हूँ किसी सूखे समंदर का
जो हवा के साथ कुछ कुछ
हवा सा हो गया है
मेरा कुछ कुछ तुम सा हो गया है
मैं धुंध हूँ सर्द सुबह की
या किसी प्रेमी जोड़े के बीच
सुलगते मद्धम अलाव की
मेरे एक हिस्से में
जहाँ दिल होता है
कुछ जम सा गया है
मैं, मैं नहीं हूँ
पानी हूँ, खारी किसी नदी का
जो अपनी ही प्यास में तड़प रही है
ख़ुद को दोहरा रहा हूँ अब
या पहले से आगे बढ़ गया हूँ
इस सवाल की गहराई में
शायद फंस सा गया हूँ
मुझे रेत से, ज़मीन से, पानी से, हवा से
इश्क़ हो गया है,
मुझे मेरे होने का ज़रा सा इल्म हो गया है
मैं हूँ सब
बस वो नहीं, जिसका तुझे यकीन हो गया है।


















