जो हम देखते हैं, वही भाव उठता है
चलो इसे हम एक कहानी से समझते हैं…बहुत समय पहले एक शांत जंगल में एक साधु रहते थे। उनके पास दो शिष्य थे—आरव और नील।एक दिन साधु ने दोनों को एक-एक टोकरी दी और कहा, “जंगल में जाओ और जो तुम्हें अच्छा लगे, उसे इस टोकरी में भर लाओ।”आरव पूरे जंगल में घूमता रहा, उसने सुंदर फूल, हरे पत्ते, और मीठे फलों को इकट्ठा किया।वहीं नील ने वही जंगल देखा, लेकिन उसका ध्यान काँटों, सूखी टहनियों और गंदगी पर गया—उसने वही सब अपनी टोकरी में भर लिया।शाम को दोनों लौटे।साधु ने आरव की टोकरी देखी—खुशबू, रंग और ताजगी से भरी हुई।फिर नील की टोकरी देखी—जिससे बदबू आ रही थी।साधु मुस्कुराए और बोले,“जंगल एक ही था… पर तुम दोनों ने जो देखा, वही तुम अपने साथ ले आए।जीवन भी ऐसा ही है—तुम जो देखते हो, वही तुम्हारे भीतर भाव बनकर बस जाता है।”
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