Top rated shayari
जम्अ करती है मुझे रात बहुत मुश्किल से सुब्ह को घर से निकलते ही बिखरने के लिए – जावेद शाहीन
मुझ से ज़ियादा कौन तमाशा देख सकेगा गाँधी-जी के तीनों बंदर मेरे अंदर – नाज़िर वहीद
वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है – बशीर बद्र
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है -बशीर बद्र
क…
View On WordPress











