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इसलिए मनाई जाती है छोटी दिवाली, जानिए इस दिन को नरक चतुर्दशी कहे जाने की वजह
चैतन्य भारत न्यूज दिवाली के एक दिन पहले छोटी दिवाली मनाई जाती है जिसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन घरों में यमराज की पूजा की जाती है। छोटी दिवाली पर शाम के वक्त घर में दीपक लेकर घूमने के बाद उसे बाहर कहीं रख दिया जाता है। इस दिन कुल 12 दीपक जलाए जाते हैं। मान्यता है कि यमराज के लिए तेल का दीपक जलाने से अकाल मृत्यु भी टल जाती है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || ).push({});
छोटी दिवाली के दिन श्रीकृष्ण की उपासना भी की जाती है क्योंकि इसी दिन उन्होंने नरकासुर का वध किया था। इसलिए इसे नरक चतुर्दशी कहा जाता है। खास बात यह है कि आज के दिन हनुमान जी का भी जन्म हुआ था। इस दिन सूरज निकलने से पहले नहाना काफी शुभ माना गया। इस दिन स्नान करना क्यों है शुभ? छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी प्रातःकाल या सायंकाल चंद्रमा की रौशनी में जल से स्नान करना चाहिए। इस दिन उबटन लगाकर स्नान करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से न केवल अद्भुत सौन्दर्य और रूप की प्राप्ति होती है, बल्कि स्वास्थ्य की तमाम समस्याएं भी दूर होती हैं। छोटी दिवाली का दिन स्नान करने के बाद दीपदान भी अवश्य करना चाहिए।
छोटी दिवाली पर दीपक का महत्व इस दिन आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए दीपक जलाने की मान्यता है। ऐसा करना यमदेवता के लिए दीपदान कहते हैं। मान्यता है कि दीपक का मुख दक्षिण दिशा ओर होना चाहिए। इस दिन मां अन्नपूर्णा की पूजा का भी विधान है। ये भी पढ़े.... आखिर क्यों मनाई जाती है नरक चतुर्दशी? जानिए इसकी पौराणिक कथा आज है नरक चतुर्दशी, जानिए इसका महत्व और पूजा-विधि इस बार दिवाली पर बन रहा है शुभ संयोग, जानिए मां लक्ष्मी की पूजा का मुहूर्त Read the full article
आखिर क्यों मनाई जाती है नरक चतुर्दशी? जानिए इसकी पौराणिक कथा
चैतन्य भारत न्यूज दिवाली से एक दिन पहले चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। इसे नरक चतुर्दशी के अलावा यम चतुर्दशी और रूप चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। इस बार नरक चतुर्दशी 13 नवंबर को पड़ रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस नरक चतुर्दशी को मनाने के कारण क्या है? अगर नही तो आइए जानते हैं नरक चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || ).push({});
नरक चतुर्दशी कथा पुराणिक कथाओं के मुताबिक, नरकासुर नामक राक्षस ने देवता और साधु संतों को परेशान किया हुआ था। राक्षस नरकासुर ने एक दिन देवताओं और संतों की 16 हजार स्त्रियों को बंधक बना लिया। तब सभी देवता और साधु-संत भगवान श्री कृष्ण के पास गए और नरकासुर के आतंक से मुक्ति का निवेदन किया तो भगवान कृष्ण ने नरकासुर को स्त्री के हाथों से मरने का श्राप दिया।
तब भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की मदद से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को राक्षस नरकासुर का वध कर दिया और 16 हजार स्त्रियों उसकी कैद से आजाद कराया। तब से उन सभी को 16 हजार पट रानियां के नाम से जाने जाना लगा और कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के नाम से पूजा जाने लगा।
शुभ मुहूर्त चतुर्दशी तिथि 13 नवंबर को शाम 5 बजकर 59 मिनट के बाद शुरू होगी और 14 नवंबर 2 बजकर 17 मिनट पर खत्म होगी. नरक चतुर्दशी की पूजा करने का शुभ मुहूर्त 14 नवंबर को सुबह 5 बजकर 23 मिनट से सुबह 6 बजकर 43 मिनट तक है. इस 1 घंटे 20 मिनट में आप नरक चतुर्दशी की पूजा कर सकते हैं. ये भी पढ़े... इस बार दिवाली पर बन रहा है शुभ संयोग, जानिए मां लक्ष्मी की पूजा का मुहूर्त इस दिवाली पटाखे जलाने पर खानी पड़ सकती है जेल की हवा, लग सकता है 10 करोड़ तक का जुर्माना इसलिए धनतेरस पर की जाती है भगवान धन्वंतरि की पूजा, जानिए उनके इस रूप की महिमा Read the full article
डोल ग्यारस आज, इस व्रत को करने से हर संकट का होता है अंत, जानिए इसका महत्व और पूजा-विधि
चैतन्य भारत न्यूज हिंदू धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को डोल ग्यारस मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं, इसीलिए इसे 'परिवर्तनी एकादशी' भी कहा जाता है। इसके अलावा भी इसे 'पद्मा एकादशी', 'वामन एकदशी' और 'जलझूलनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है। इस साल डोल ग्यारस 29 अगस्त 2020 को है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। आइए जानते हैं डोल ग्यारस का महत्व और पूजा-विधि।
डोल ग्यारस का महत्व डोल ग्यारस के दिन व्रत करने से व्यक्ति के सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है। कहा जाता है कि कृष्ण जन्म के अठारहवें दिन माता यशोदा ने उनका जलवा पूजन किया था। इसी दिन को 'डोल ग्यारस' के रूप में मनाया जाता है।
डोल ग्यारस के दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की भी पूजा की जाती है, क्योंकि इसी दिन राजा बलि से भगवान विष्णु ने वामन रूप में उनका सर्वस्व दान में मांग लिया था एवं उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर अपनी एक प्रतिमा राजा बलि को सौंप दी थी, इसी वजह से इसे 'वामन ग्यारस' भी कहा जाता है। जो भी इस एकादशी में भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, उसके हर संकट का अंत होता है।
डोल ग्यारस पूजा-विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर एकादशी व्रत करने का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विष्णु और कृष्ण के बाल रूप की आराधना करें और उनकी मूर्ति के समक्ष घी का दीपक जलाएं। पूजा में तुलसी और फलों का प्रयोग करें। शास्त्रों के अनुसार इस दिन अन्न का दान अवश्य करना चाहिए। अगले दिन द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद व्रत खोल लें। ये भी पढ़े... दरिद्रता से बचना चाहते हैं तो गणेश चतुर्थी पर भूलकर भी न करें ये गलतियां भगवान गणेश ने क्यों लिया विकट अवतार, जानिए इसका रहस्य Read the full article
परिवर्तिनी एकादशी : इस दिन करवट बदलते हैं श्री हरि विष्णु, इस कथा को पढ़ने से मिलती है पापों से मुक्ति
चैतन्य भारत न्यूज हिंदू धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को डोल ग्यारस मनाई जाती है। मान्यता है कि इस एकादशी के दिन भगवान श्री हरि विष्णु क्षीर सागर में शयन करते हुए करवट लेते हैं इसलिए इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इसके अलावा भी इसे 'पद्मा एकादशी', 'वामन एकदशी' और 'जलझूलनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है। इस साल परिवर्तिनी एकादशी 29 अगस्त 2020 को है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। आइए जानते हैं डोल ग्यारस का महत्व और पूजा-विधि। परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा त्रेता युग की बात है। बलि नाम का एक दैत्य था। वह दैत्यों का राजा था। भगवान विष्णु का परम भक्त था। विष्णु जी को अपना आराध्य मान उनका पूजन किया करता था। साथ ही ब्राह्मणों का भी आदर सत्कार किया करता था। उन्हें कभी खाली हाथ नहीं लौटने देता था। बलि का इंद्रदेव से बैर था। उसने अपनी शक्तियों से सभी देवी-देवताओं सहित इंद्र को जीत लिया था। तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। दैत्य के शासन का विस्तार देखकर सभी देवता चिंतित हो गए कि पृथ्वी पर दैत्यों का शासन स्थापित हो जाएगा। इसलिए सभी देवी-देवता भगवान विष्णु की शरण में गए। उनकी स्तुति कर उनसे इस समस्या का समाधान मांगा। भगवान विष्णु ने उनको आश्वासन दिया कि वह संपूर्ण विश्व पर दैत्यों का राज नहीं होने देंगे। क्योंकि इससे पृथ्वी का संतुलन बिगड़ जाएगा और चारों ओर हिंसा फैल जाएगी। उन्होंने दैत्य राजा बलि से तीनों लोक मुक्त कराने के लिए वामन अवतार लिया। यह भगवान विष्णु का पांचवा अवतार था। वामन अवतार लेकर भगवान विष्णु राजा बलि के महल गए। वहां जाकर उन्होंने राजा बलि से संकल्प लेने को कहा कि वह वामन देव को तीन पग भूमि दान करेंगे। वामन की बातों से दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने यह समझ लिया कि यह भगवान विष्णु हैं और यह राजा बलि से तीनो लोक लेने आए हैं। गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि को सावधान किया। लेकिन राजा बलि ने कहा यह संकल्प ले चुके हैं और वह विष्णु जी को अपना आराध्य मानते हैं तो उन्हें मना कैसे कर सकते हैं। इस पर वामन देव ने दो पगों में ही समस्त संसार और लोकों को नाप दिया। इसके बाद विष्णु जी ने वामन देव से पूछा कि अब तीसरा पग कहां रखें। इसके जवाब में बलि महाराज ने अपना सिर भगवान विष्णु के कदमों में रख दिया और कहा कि तीसरा पग आप मेरे सिर पर रखें। इसके साथ ही भगवान विष्णु ने तीनों लोगों को दैत्य शासन से मुक्त कर दिया। एकादशी के दिन व्रत कर इस कथा को पढ़ने-सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। ये भी पढ़े... जानिए कब है डोल ग्यारस, इस व्रत को करने से हर संकट का होता है अंत, जानिए इसका महत्व और पूजा-विधि अगस्त में पड़ रहे है ये प्रमुख व्रत-त्योहार, जानें तिथि और इसका महत्व Read the full article
जानिए कब है डोल ग्यारस, इस व्रत को करने से हर संकट का होता है अंत, जानिए इसका महत्व और पूजा-विधि
चैतन्य भारत न्यूज हिंदू धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को डोल ग्यारस मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं, इसीलिए इसे 'परिवर्तनी एकादशी' भी कहा जाता है। इसके अलावा भी इसे 'पद्मा एकादशी', 'वामन एकदशी' और 'जलझूलनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है। इस साल डोल ग्यारस 29 अगस्त 2020 को है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। आइए जानते हैं डोल ग्यारस का महत्व और पूजा-विधि।
डोल ग्यारस का महत्व डोल ग्यारस के दिन व्रत करने से व्यक्ति के सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है। कहा जाता है कि कृष्ण जन्म के अठारहवें दिन माता यशोदा ने उनका जलवा पूजन किया था। इसी दिन को 'डोल ग्यारस' के रूप में मनाया जाता है।
डोल ग्यारस के दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की भी पूजा की जाती है, क्योंकि इसी दिन राजा बलि से भगवान विष्णु ने वामन रूप में उनका सर्वस्व दान में मांग लिया था एवं उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर अपनी एक प्रतिमा राजा बलि को सौंप दी थी, इसी वजह से इसे 'वामन ग्यारस' भी कहा जाता है। जो भी इस एकादशी में भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, उसके हर संकट का अंत होता है।
डोल ग्यारस पूजा-विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर एकादशी व्रत करने का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विष्णु और कृष्ण के बाल रूप की आराधना करें और उनकी मूर्ति के समक्ष घी का दीपक जलाएं। पूजा में तुलसी और फलों का प्रयोग करें। शास्त्रों के अनुसार इस दिन अन्न का दान अवश्य करना चाहिए। अगले दिन द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद व्रत खोल लें। ये भी पढ़े... दरिद्रता से बचना चाहते हैं तो गणेश चतुर्थी पर भूलकर भी न करें ये गलतियां भगवान गणेश ने क्यों लिया विकट अवतार, जानिए इसका रहस्य Read the full article
जानिए कब है डोल ग्यारस, इस व्रत को करने से हर संकट का होता है अंत, जानिए इसका महत्व और पूजा-विधि
चैतन्य भारत न्यूज हिंदू धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को डोल ग्यारस मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं, इसीलिए इसे 'परिवर्तनी एकादशी' भी कहा जाता है। इसके अलावा भी इसे 'पद्मा एकादशी', 'वामन एकदशी' और 'जलझूलनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है। इस साल डोल ग्यारस 29 अगस्त 2020 को है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। आइए जानते हैं डोल ग्यारस का महत्व और पूजा-विधि।
डोल ग्यारस का महत्व डोल ग्यारस के दिन व्रत करने से व्यक्ति के सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है। कहा जाता है कि कृष्ण जन्म के अठारहवें दिन माता यशोदा ने उनका जलवा पूजन किया था। इसी दिन को 'डोल ग्यारस' के रूप में मनाया जाता है।
डोल ग्यारस के दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की भी पूजा की जाती है, क्योंकि इसी दिन राजा बलि से भगवान विष्णु ने वामन रूप में उनका सर्वस्व दान में मांग लिया था एवं उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर अपनी एक प्रतिमा राजा बलि को सौंप दी थी, इसी वजह से इसे 'वामन ग्यारस' भी कहा जाता है। जो भी इस एकादशी में भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, उसके हर संकट का अंत होता है।
डोल ग्यारस पूजा-विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर एकादशी व्रत करने का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विष्णु और कृष्ण के बाल रूप की आराधना करें और उनकी मूर्ति के समक्ष घी का दीपक जलाएं। पूजा में तुलसी और फलों का प्रयोग करें। शास्त्रों के अनुसार इस दिन अन्न का दान अवश्य करना चाहिए। अगले दिन द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद व्रत खोल लें। ये भी पढ़े... दरिद्रता से बचना चाहते हैं तो गणेश चतुर्थी पर भूलकर भी न करें ये गलतियां भगवान गणेश ने क्यों लिया विकट अवतार, जानिए इसका रहस्य Read the full article
आज है नरक चतुर्दशी, जानिए इसका महत्व और पूजा-विधि
चैतन्य भारत न्यूज दिवाली से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी और रूप चतुर्दशी आती है। इस साल नरक चतुर्दशी 26 अक्टूबर को पड़ रही है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में तेल लगाकर स्नान करने से नरक से मुक्ति मिल जाती है। आइए जानते हैं नरक चतुर्दशी का महत्व और पूजा-विधि। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || ).push({});
नरक चतुर्दशी का महत्व छोटी दिवाली को यम चतुर्दशी, रूप चतुर्दशी या रूप चौदस भी कहा जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध महीने में आए हुए पितर इसी दिन चंद्रलोक वापस जाते हैं। पुराणों के मुताबिक, इस दिन अमावस्या होने के कारण चांद नहीं निकलता जिससे पितर भटक सकते हैं इसलिए उनकी सुविधा के लिए नरक चतुर्दशी के दिन एक बड़ा दीपक जलाया जाता है। यमराज और पितर देवता अमावस्या तिथि के स्वामी माने जाते हैं। इस दिन कृष्ण भगवान ने राक्षस नरकासुर का वध किया था। जिस दिन नरकासुर का अंत हुआ, उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी।
नरक चतुर्दशी पूजा-विधि सुबह उठकर स्नान के बाद तिल का तेल शरीर पर मलें और तुलसी के पौधे को सिर के ऊपर से चारों ओर तीन बार घुमाएं। ऐसी मान्यता है कि जो लोग इस दिन स्नान करते हैं उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। साथ ही उनके सौंदर्य में भी वृद्धि होती है। इस दिन दक्षिण दिशा में हाथ जोड़कर यमराज को प्रणाम करें और उनसे अपनी रक्षा का वचन लें। इस दिन श्रीकृष्ण की भी पूजा करने की मान्यता है। नरक चतुर्दशी पर यम का दीपक जलाना चाहिए।
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