अगर यह आज़ादी है तो सुकून और खुशी कहां खो गई?
हम इंसानों की फितरत एक परिंदे जैसी है। हम उड़ना चाहते हैं बहुत दूर। इतना ही नहीं, अगर हमारे आस-पास उसूलों के कुछ बंधन होते हैं तो बहुत लोगों के मन में उसूलों को तोड़कर अपनी आज़ादी को पा लेने का ख्याल आता है। और आज कहीं ना कहीं लोगों ने अपनी उस आज़ादी को पा भी लिया है। अपने लिए सोचना, अपने पैसे को सिर्फ अपने पर खर्च करना अब आम हो गया है। अब तो आलम यह है कि लोगों को अपने पड़ोस में कौन रहता है इसका भी पता नहीं होता। आखिर हम तथाकथित आज़ाद लोग अपने में इतना गुम हैं कि अपने आस-पास की चीज़ों को देखकर भी देखना नहीं चाहते। लेकिन खुद पर केंद्रित आज की ज़िंदगी क्या वाकई में बहुत अच्छी है? इस आज़ादी की कीमत कहीं हमने अपने सुकून को खोकर तो नहीं चुकाई? यह सोचने की बात है क्योंकि इस आज़ादी की कीमत एक अकेलापन भी है...
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