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पवित्र गीता जी अध्याय 9 श्लोक 25 में साफ लिखा है कि भूतों को पूजोगे तो भूतों की योनियों में जाओगे और पितर पूजोगे तो पितर योनि में जाओगे।
फिर क्यों आप श्राद्ध कर्म, पिंड दान आदि करते हो? ये मोक्ष मार्ग के विपरीत क्रियाएं हैं।
अधिक जानने के लिए हिन्दू साहेबान! नहीं समझे गीता, वेद, पुराण पुस्तक को Sant Rampal Ji Maharaj App से डाउनलोड करके पढ़ें।
पवित्र गीता अध्याय 2 श्लोक 7 में अर्जुन ने कहा है कि मैं आपका शिष्य हूँ। मैं आपकी शरण में हूँ।
विचार - अर्जुन तो पहले ही श्री कृष्ण जी की शरण में था। फिर उसको श्री कृष्ण गीता अध्याय 18 श्लोक 66 में यह नहीं कहेंगे कि मेरी धार्मिक साधना को मुझमें त्यागकर मेरी शरण में आजा। ‘‘व्रज‘‘ का अर्थ जाना है। श्री ज्ञानानंद जी ने ‘‘व्रज’’ का अर्थ आना किया है। इससे पूरी गीता का भावार्थ ही बदल जाता है। संस्कृत शब्दकोश में देखेंगे तो व्रज का अर्थ जाना ही है।
- जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज
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अनुत्तम का अर्थ अश्रेष्ठ है जबकि इसका अर्थ ‘‘अति उत्तम’’ किया है जो गलत है।
गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में कहा है कि मेरी भक्ति से पूर्ण मोक्ष प्राप्त नहीं होता यानि
अपनी गति अर्थात मोक्ष को अश्रेष्ठ बताया है। गीता अध्याय 4 श्लोक 5 के अनुसार गीता ज्ञान दाता और उसके साधक का जन्म-मरण बना ही रहता है। इस भक्ति से जन्म-मरण समाप्त नहीं होता। (उत्तम भक्ति तो वो है जिससे साधक का जन्म-मरण समाप्त हो जाए) इसलिए गीता ज्ञान दाता ने अपनी साधना को अनुतमाम् यानि घटिया कहा है।
परंतु श्री ज्ञानानंद जी ने अनुत्तम का अर्थ अति उत्तम किया है जो अनर्थ है। इससे पूरी गीता का आशय ही विपरीत हो जाता है।
- जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज
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#आध्यात्मिक_ज्ञान_चर्चा
गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता बोलने वाले प्रभु ने अपने से अन्य किस परमेश्वर की शरण में जाने को कहा है?
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ज्ञानानंद जी को यह ज्ञान है कि रजगुण श्री ब्रह्मा जी हैं, सतगुण श्री विष्णु उर्फ श्री कृष्ण जी हैं तथा तमगुण श्री शंकर उर्फ महादेव जी हैं। फिर भी उन्होंने स्पष्ट नहीं किया कि गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तथा 20 से 23 में सतगुण श्री
गीताजी अध्याय 4 श्लोक 5 में गीता ज्ञान देने वाला भगवान स्वयं को जन्म मरण के अंतर्गत बता रहा है, फिर जन्म मरण से परे अविनाशी व पूजनीय पूर्ण परमात्मा कौन है?
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