नाट्य लेखन का कृत्रिम संकट: आलेख (राजेश कुमार) जो लोग छाती पीट-पीट कर आज नाटक न लिखे जाने को रोना रोते हैं, वे आजादी के बाद धर्मवीर भारती और मोहन रोकष से आगे बढ़ ही नहीं पाते। उनकी सूई उन्हीं तक अटकी हुई है, या आजादी के पूर्व की बात करें तो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और जयशंकर प्रसाद तक। वे भूल जाते हैं कि उन दिनों पारसी थियेटर में भी निरंतर व्यवसायिक नाटक का लेखन हो रहा था। आगाहश्र कश्मीरी, पं राधेश्याम कथावाचक, नारायण प्रसाद ‘बेताब’ जैसे नाटककारों ने पारसी थियेटर से जुडकर दर्जनों उत्कृष्ट नाटकों को लेखन किया। ‘मार्शिकी हूर’ नाटक तो आज भी अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखे हुए हैं। अछूत के सवालों पर केंद्रित कर अछूतानंद ‘हरिहर’ का नाटक ‘राम राज्य न्याय’ को जान बूझकर दरकिनार किया गया पर उसमें उठाये गये सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं। इसी संदर्भ में फुले के नाटक भी उल्लेखनीय हैं। वंचित समाज पर लिखे गये नाटक तब भी साहित्य में उपेक्षित रहा, आज भी उस पर कोई विशेष तवज्जो नहीं है। जानबूझकर हाशिये पर डाल दिया गया है।















