#Innovative_Classes_Gonda #Innovative_Minds #VashistNarayanSingh #Innovative_Mathematics वह गुमनाम गणितज्ञ जिसने आंइस्टीन के फार्मूले को दी थी चुनौती, अब प्रकाश झा बनाएंगे उनकी बायोपिक। भारत देश की जन्मभूमि हमेशा से ही प्रतिभाओं की धनी रही है। इनका नाम है डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह। बिहार के भोजपुर जिले के ताल्लुक वाले वशिष्ठ नारायण सिंह का जन्म 2 अप्रैल 1942 को बसंतपुर गांव में हुआ था। वशिष्ठ नारायण के द्वारा कई ऐसे रिसर्च किए गए हैं जिसे आज भी अमेरिकी छात्रों द्वारा प्रमुखता से पढ़ा जाता है। लेकिन अचानक वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि वह अपनी ही राज्य में एक गुमनाम जिंदगी जीने पर मजबूर हो गए। वर्ष 1977 में उन्हे सीजोफ्रेनिया नामक मानसिक बीमारी ने जकड़ लिया। जिससे वो आज तक मुक्त नहीं हो पाए। बिखरे बाल, बढ़ी हुई ढाढी और अस्त व्यस्त कपड़े कुछ ऐसी ही जिंदगी रह गयी है इस महान गणितज्ञ की। अभी भी इनके कमरे किताबों से भरे पड़े हैं और दीवार पर गणित के कई फर्मूला लिखे हुए हैं।अमेरिका में उनकी प्रतिभा से प्रभावित हो कर प्रोफेसर कैली ने उन्हे बरकली आ कर शोध करने का निमंत्रण दिया।1969 में उन्होने कैलीफोर्निया विश्वविघालय में पी.एच.डी. की डिग्री भी प्राप्त की। वशिष्ठ नारायण सिंह ने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को चुनौती दी थी। उनके बारे में मशहूर है कि नासा में अपोलो की लांचिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था। मगर जल्द ही 1972 में अमेरिका में लाखों की तनख्वाह वाली नौकरी को छोड़ वे वापस भारत आ गए। अमेरिका से वापस लौटते ही वशिष्ठ नारायण सिंह आईआईटी कानपुर में पढ़ाने लगे। इसके 8 महीने बाद टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च मुंबई चले गए। बाद में वो इंडियन स्टैटीस्टीकल इंस्टीटयूट (आईएसआई) कोलकता में पक्की नौकरी करने लगे। इस बीच पिता के कहने पर वर्ष 1973 में छपरा के एक प्रतिष्ठित परिवार की डॉक्टर लड़की वंदना रानी से उनकी शादी हो गई। पर इसी बीच वशिष्ठ नारायण की दिमागी हालात थोड़ी बिगड़ने लगी। वे छोटी छोटी बातों और गुस्से हो जाते थे। दुर्भाग्य से इन्ही कारणवश 1976 में उनकी शादी टूट गई। तकरीबन 40 साल से मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित वशिष्ठ नारायण सिंह पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन बिता रहे हैं। अब भी किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनकी सबसे अच्छी दोस्त है। अमरीका से वह अपने साथ 10 बक्से किताबें लाए थे, जिन्हें वे आज भी पढ़ते हैं। उम्मीद है हम एक दिन अपनी अनमोल प्रतिभाओं का उचित सम्मान करना सीखेंगे। (at Innovative Classes) https://www.instagram.com/p/BnpaZVIHMvy/?utm_source=ig_tumblr_share&igshid=1kuxigni0wa9k