महाभारत शान्तिपर्व 251- 7 के अनुसार काम रूपी बंधन की सूक्ष्म व्याख्या समस्त क्रियाएँ शरीर, इन्द्रियों, मन और बुद्धिसे ही होती हैं। ये चारों कर्म करनेके साधन हैं। यदि इनमें काम रहता है तो वह परमार्थिक कर्म नहीं होने देता। इसलिये कर्मयोगी निष्काम, निर्मम और अनासक्त होकर शरीर, इन्द्रियों, मन और बुद्धिके द्वारा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करता है (गीता 5-11)।वास्तवमें काम अहम्-(जड-चेतनके तादात्म्य-) में ही रहता है। अहम् अर्थात् 'मैं'-पन केवल माना हुआ है। मैं अमुक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदायवाला हूँ- यह केवल मान्यता है। मान्यताके सिवाय इसका दूसरा कोई प्रमाण नहीं है। इस माने हुए सम्बन्धमें ही कामना रहती है। कामनासे ही सब पाप होते हैं। पाप तो फल भुगताकर नष्ट हो जाते हैं, पर 'अहम्' से कामना दूर हुए बिना नये-नये पाप होते रहते हैं। इसलिये कामना ही जीवको बाँधनेवाली है। महाभारतमें कहा है-- 'कामबन्धनमेवैकं नान्यदस्तीह बन्धनम्।' कामबन्धनमुक्तो हि ब्रह्मभूयाय कल्पते।। 'जगत में कामना ही एकमात्र बन्धन है, दूसरा कोई बन्धन नहीं है। जो कामना के बन्धन से छूट जाता है, वह ब्रह्मभाव प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।' ------------------ #sanskrit #india #culture #krishnaupadesam #krishnaconsciousness #vayuputra #goodquotes #kaam #coronavirus #corona #covid #lockdown #stayhome #staysafe #mahabharata #essentialworkers #geetashlok (at Lucknow-लखनऊ) https://www.instagram.com/p/CCvzoixAd3j/?igshid=qekfo35eocy0











