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मन है कि जा बसा है अनजान इक नगर में!
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शंकरजयकिशन की उत्कृष्ट संगीत रचनाओं में आम्रपाली फ़िल्म को किस स्थान पर रखे,इसका निर्धारण करना अतिं कठिन कार्य है!किन्तु आम्रपाली को शंकरजयकिशन के संगीत की दस सर्वश्रेष्ठ फिल्मो में आम्रपाली को रखना ही होगा।यह शंकरजयकिशन के संगीत की अतिं अनमोल धरोहर है। इस फ़िल्म के संगीत ने राजकपूर तक को हिलना पढ़ गया,ओर वह फ़िल्म के निर्देशक लेखटंडन के पास विरोध दर्ज कराने जा पहुंचे कि एक गीत की धुन उनके संगीत बैंक की है!लेखटंडन परेशान हो गए क्योकि सेट तैयार था और रेकॉर्डिंग शेष थी।महान शंकरजी ने लेखटंडन को समझाया और वह धुन राजकपूर को सौंप दी गई जिसका उपयोग कालांतर में राजकपूर ने फ़िल्म मेरा नाम जोकर में किया..गीत था सदके हीर तुझपे ..जिसे रफी साहिब ने बहुत ही शिद्दत से गाया, इस हीर जैसा गीत कभी बन ही न सका,यह कालजयी हीर गीत था।किंतु आम्रपाली के निर्देशक लेखटंडन इस घटना से परेशान हो गए कि अब क्या होगा?शंकरजी ने शैलेंद्रजी को याद किया और तत्काल एक अन्य धुन पर उन्हें गीत लिखने को कहा,शैलेंद्रजी ने तत्काल उस धुन पर लिखा और जो गीत बना वह अजर अमर हो गया..जाओ रे जोगी तुम जाओ रे..लेखटंडन हैरत से शंकरजी को देखने लगे ,उन्हें लगा कि शंकरजयकिशन संगीत के जादूगर है,दुर्भाग्यवश यह गीत वीडियो पर उपलब्ध् नही है तथापी यह गीत आज भी लोकप्रिय है।
राजकपूर का वश चलता तो वह शंकरजयकिशन को सिर्फ अपनी फिल्मो में ही संगीत देने के अनुबंधित करते किन्तु ऐसा संभवतया हो नही पाया?
पूर्णिमा की रात्री है,चंद्रमा का धवल प्रकाश पूरे जगत को नहला रहा है,चंद्रमा का शीतल समुन्द्र पर भी पड़ रहा है।समुन्द्र की तेज लहरों में वह रोशनी छिटक छिटक कर चहुं ओर फैल रही है।इस प्रकार का चंद्रमा का पूर्ण स्वरूप,पूर्ण प्रतिबिम्ब समुन्द्र की सतह पर बनने व कुछ देर स्थिर होने से पूर्व ही बिखर जाता है।चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं के साथ प्रकाशित होकर बार बार अपने पूर्ण रूप में जल की सतह पर टिकने,स्थिर होने की कोशिश करता,परन्तु समुन्द्र की विशाल जल राशी उसे ऐसा होने ही नही देती और उसे बहाकर कही और पहुंचा देती है परंतु लहरे जैसे ही एकाएक शांत होती है तो चंद्रमा का धवल प्रकाश अपने पूर्ण रूप में जल की सतह पर प्रकट हो जाता है।चंद्रमा के इस शांत,सौम्य स्वरूप के अमृत सौंदर्य का क्या कहना!इस वर्णातित सौंदर्य को कोई कैसे बयान कर सकता है।इसकी तो अनुभूति मात्र ही कही जा सकती है।किसी कवि द्वारा वर्णीत उक्त पंक्तियॉ की भांति आम्रपाली की स्थिति है।उसके चित्त सागर में कल्पनाओं,कामनाओं,वासनाओं के ज्वार भाटे उठते जा रहे है।रह रहकर,रुक रुक कर यह लहरे आती जाती प्रतीत होती है।चित्त सागर में उठ रही कामनायें,वासनाएँ की लहरें बैचैनी से किसी को याद कर रही है और वह गा रही है...तुम्हे याद करते करते!यह प्रतिक्षा ओर बैचैनी का भाव उसके मन मे उठ रहे भावो का प्राकट्य दर्शा रहे है। वर्ष 1966 में ईगल फिल्म्स के बैनर तले बनी फिल्म र्आम्रपाली के निर्माता थे एफ.सी.मेहरा,निर्देशक थे लेख टण्डन।इस फ़िल्म की मुख्य भूमिका में थे सुनील दत्त और वैजयंतीमाला। फ़िल्म आम्रपाली वैजयन्तीमाला के नृत्य,अभिनय एवं सौंदर्य के कारण तो सदा याद की जाएगी किन्तु शंकरजयकिशन का इसमे कालजयी संगीत था,ऐसा संगीत जिसकी कल्पना भी नही की जा सकती। शैलेंद्र आम्रपाली की बैचैनी और तड़फ का कितना सुंदर निरूपण करते है,रात्रि का अंधकार समूचे जहाँ में पसरा पड़ा है,सम्पूर्ण महल को रात्रि ने अपने आगोश में ले रखा है,मध्यम प्रकाश आम्रपाली के कक्ष में फैला हुआ है कि उसके मन के तारो की अभिव्यक्ति शैया पर पड़ी वीणा के तारो से संगीत उत्पन्न करने लगती है।शंकरजयकिशन का यह वीणा का संगीत इतना प्रभावशाली है कि श्रोता अथवा दर्शक उसमे खो जाता है,ओर यही पर शब्द आकर अपना प्रभाव छोड़ते है.... तुम्हे याद करते करते जायेगी रेन सारी,तुम ले गए हो अपने संग नींद भी हमारी.. वैजयंतीमाला का सौंदर्य ,भाव अभिव्यक्ति कमाल की है,बौद्धकालीन पोशाक में उनका सौंदर्य देखते ही बनता है जो अहसास कराता है कि वैशाली की नगर वधू कैसी होती थी!क्यो अभिजात्य वर्ग उसके इस अप्रितम सौंदर्य के प्रति आसक्त था।सब कुछ भरा पड़ा है इस गीत में..सौंदर्य,प्रतीक्षा, उत्कृष्ट गीत संगीत।शंकरजयकिशन का संगीत इस गीत में धीमी धीमी हवा के मानिन्द बहता प्रतीत होतां है जो हृदय में कंपन करता है,वीणा के तारों की झंकार हृदय और मन के तारों को झंकृत करने लगती है तभी लतामंगेशकर की मिश्री सी आवाज शंकरजयकिशन के संगीत में घुलकर शैलेन्द्र के शब्दों को रात्रि की निस्तब्धता में गूँजने लगती है... मन है के जा बसा है,अनजान इस नगर में कुछ खोजता है पागल खोई हुई डगर में इतने बड़े महल में घबराऊँ में बिचारी तुम ले गए हो अपने संग नींद भी हमारी... मन अनजान नगर में जा बसा है,जो किसी को खोज खोज कर पागल हो रहा है,खोयी हुई डगर में तलाश रहा है उस अपने को जिसकी याद आ रही है,यही कारण है कि इतने विशाल महल में आम्रपाली घबरा रही है स्वयं को बेचारी स्वीकार कर रही है।सब खेल मन के है,यह तो एक उड़ता पंछी है जिसे जितना चाहे उड़ा लो!सम्पूर्ण जीवन ही मन की इच्छा पर निर्भर करता है जब इसे मारना पड़ता है तो हम दुखी हो जाते है,किन्तु मन कभी नही मरता ,इसका संबंध शरीर से नही आत्मा से है,आत्मा अमिट है तो मन भी अमिट, मन के कारण ही देह दैहिक सुख प्राप्त करती है अथवा दुख प्राप्त करती है।मन को कोई आकार नही होता है यह सूक्ष्म से विराट जैसा लगता है किंतु निराकार होता है।वस्तु या जगत किसी एक मन अथवा चित्त के अधीन नही है।प्रकृति के तीन गुणों क्रमशः जड़ता,सक्रियता, ज्ञान ने जगत का अतिंव्यापक निर्माण किया है।इसके अनंत विस्तार में अनंत अनंत वस्तुएं, पदार्थ व साधन है।इसमे सभी कुछ है,परंतु सब के लिए सब कुछ नही है।सबको,सब कुछ मिलता भी नही है।जीवन और जगत के मेल के लिए प्रकृति के अदृश्य नियम एवं अदृश्य व्यवस्थाएं है।वासना के साथ शुभ और अशुभ कर्मो का परिपाक व परिणाम होता है।तब उसके अनुकूल परिस्थितियाँ, परिदृश्य व घटना क्रम होते है।इनका प्रभाव किसी एक चित्त के लिए एक विशेष समय तक होता है जैसा कि आम्रपाली के साथ हो रहा है।कालक्रम में चित्त की अवस्था परिवर्तन के साथ ये संयोग में परिवर्तित हो जाते है।ऐसा नही है कि ऐसे में उनका अस्तित्व नहीं रहता।इसका अस्तित्व बना रहता है,बस उस चित्त अथार्थ मन के लिए नही रहता।इसका संयोग कर्मानुसार, प्रकृति के नियमानुसार किसी ओर के लिए हो जाता है। जीवन व जगत का यह संयोगक्रम ,चित्त और वस्तु का यह परस्पर संबंध व बिछोह चलता रहता है।चित्त पर वस्तु के पथ बदलते रहते है। किस प्रकार शैलेन्द्र ने उक्त व्याख्या को मात्र दो पंक्तियों में समेट दिया है और उसे गीत का आकार दिया है...मन है कि जा बसा है अनजान इक नगर में कुछ खोजता है पागल खोई हुई डगर में.... शंकरजयकिशन और शैलेंद्र का यही मुख्य गुण था कि वह रमते जोगी की भांती गीत संगीत साधना करते थे।फ़िल्म आम्रपाली का यह गीत इसका उत्कृष्ट प्रमाण है। विरह की अग्नि में धधकती आम्रपाली फिर वीणा के झंकृत तारों के साथ रात्रि की नीरवता को भंग करती हुई पुकारती है.... विरहा की इस चिता से तुम ही मुझे निकालो जो तुम न आ सको तो मुझे स्वप्न में बुला लो..... विरहा की चिता पर बैठी आम्रपाली अपने प्रियतम को पुकार कर कह रही है कि मुझे यह विरह स्वीकार नही,यदि तुम नही आ सकते तो मुझे अपने स्वप्नों में बुला लो पर मुझसे मिलो कुछ तो उपाय करो।सपनो का संसार अदभूद होता है,इस पर सवार होकर प्राणी सब कुछ बन सकता है,सपनो के कोई नियम नही होते?ईश्वर ने सभी को सपने देखने का अधिकार दिया है।आम्रपाली यहां वासनात्मक है,मिलने को आतुर है किंतु जब कोई उपाय नहीं सूझ रहा तो वह प्रियतम को संदेश दे रही है कि तुम यदि न आ सको तो कम से कम मुझे स्वप्न में ही बुला लो,एक प्यास है जो बुझना चाहती है,मिटना चाहती है,अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए व्यग्र है,यही तडफ़ कहलाती है जो पूर्णता चाहती है।विचारो में बहुत शक्ति होती है,जिसका हमारे जीवन मे गहरा प्रभाव पड़ता है।विचार एक प्रकार का आंतरिक संवाद होता है जो आम्रपाली स्वयं से कर रही है।विचार करते समय हम जिन भाँवो का चयन करते है,उनका हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।क्योंकि व्यक्ति जैसा सौचता है,वैसा ही बन जाता है।हर प्राणी सपने देखता है जिनका स्वरूप भिन्न भिन्न होता है।आम्रपाली भी अपने प्रियतम से सपनो में मिलना चाहती है और उसे सम्पूर्ण करने की कोशिश कर रही है।जीवन मे सफलता इन्ही सपनो के आधार पर मिलती है ,इन्हें मूर्त रूप देने की कोशिश की जाती है।सपने देखने का अधिकार सभी को है,आम्रपाली इसी अधिकार का प्रयोग कर रही है।सपने कभी भी पूरे किए जा सकते है,बस उन्हें पूरा करने के लिए हौसला चाहिए,फिर शरीर की ऊर्जा व क्षमता भी स्वतः साथ देने लगते है,परिदृश्य कैसा भी हो। आम्रपाली उस काल के इतिहास की प्रतीक है जब मौर्य काल पतन की और अग्रसर हो चला था,चाणक्य के अंत के बाद राजनैतिक समीकरण तेजी से बदले,बुद्ध का आविर्भाव हुआ तो नगरवधुओं की परंपरा का भी आगमन हुआ।अभिजात्य वर्ग ऐशो आराम में जीने लगा।स्त्रियों की दशा शोचनीय होने लगी।आम्रपाली को तो बुद्ध मिल गए और उसका कल्याण भी हो गया,किन्तु बुद्धत्व को अभी पूर्ण रूप से स्थापित होना शेष था। आम्रपाली को जिस प्रकार वैजयंतीमाला ने अपने अभिनय से जिया है व उनके अभिनय में ही संभव था,नृत्यकला और चेहरे के भाँवो से वैजयंतीमाला ने बेहतरीन अभिनय,बेजोड़ नृत्य शैली का परिचय दिया है।तुम्हे याद करते करते गीत में उनकी वेशभूषा और चेहरे के भाव अवर्णीय है।लतामंगेशकर ने भी आम्रपाली को आत्मसात कर वास्तविक गायन किया है कि उस ऐतिहासिक काल में कुछ समय के लिए स्वयं हम उस समय मे पहुंच जाते है।यह गायन की पराकाष्ठा है।यह हमारा दुर्भाग्य रहा कि लतामंगेशकर शंकरजयकिशन को वास्तविक रूप में पहचान ही न सकी और जब पहचानी तो बहुत देर हो चुकी थी।लतामंगेशकर का सर्वश्रेष्ठ स्वर शंकरजयकिशन को ही प्राप्त हुआ है।बरसात से लेकर चोरी चोरी तक शंकरजयकिशन व लतामंगेशकर एक दूसरे के पर्याय थे।लतामंगेशकर कि मीठी आवाज शंकरजयकिशन को ही मिली क्योकि शंकरजयकिशन उन्हें निरंतर अवसर देते रहे और लतामंगेशकर मजबूती से स्थापित हो गयी।आम्रपाली फ़िल्म सम्पूर्ण रूप से शंकरजयकिशन के संगीत के बल पर आज भी याद की जाती है।जब शंकरजयकिशन कि आम्रपाली का संगीत बाजार में आया तो उन पर भारी शोर करने वाले आरकेस्ट्रा का आरोप मड़ दिया गया,क्या तुम्हें याद करते करते है में कही भारी आरकेस्ट्रा का अहसास आपको हुआ है?संभवतया नही।किन्तु शंकरजयकिशन के संगीत को सदा अग्नि परीक्षा देनी पड़ी जिसमे हर बार उनकी विजय हुई।शैलेन्द्र के लिखे इस गीत को क्या विस्मृत किया जा सकता है?नही कदापि नही, यह तो कालजयी गीत है,कालजयी वही होते है जिनके अंदर शिव का निवास होता है वही अविनाशी कहलाते है।शंकरजयकिशन एक रथ के दो अश्व की भांति थे जिन्होंने संगीत का अश्वमेव यज्ञ सम्पूर्ण किया।यहां मुझे एक घटना का जिक्र करना आवश्यक लग रहा है।रहीम जी और तुलसीदास जी परम मित्र थे,ओर अपनी कविताएं एक दूसरे को प्रेषित करते थे।एक बार रहीमदास के मन मे जिज्ञासा हुई कि गृहस्थी में रहकर भगवान् की भक्ति कैसे की जा सकती है अतः उन्होंने अपने पत्र में एक दोहा लिखकर तुलसीदास को भेजा जो निम्न प्रकार था... चलन चहत संसार की,मिलन चहत करतार। दो घोड़े की सवारी,कैसे निभे सवार।। उत्तर में तुलसीदास ने लिखकर भेजा... चलन चहत संसार की,हरि पर राखो टेक। तुलसी यूं निभ जाएंगे,दो घोड़े रथ एक!! जैसे दो घोड़ो के होते हुए भी एक रथ सहजता से चलता है।यदि मस्तिष्क सदा प्रभु भक्ति में रहे तो गृहस्थ होते हुए भी हरि भक्ति संभव है।रहीम तुलसी के उत्तर से गदगद हो गए। शंकरजयकिशन पर यही बात लागू होती है फिल्मी संगीत देते हुए भी उन्होंने माँ सरस्वती को सदा अपने अंतस में रखा और कई कालजयी विभिन्न उत्तम सार्थक रचनाओं का निर्माण किया।यही कारण है कि फ़िल्म आम्रपाली के गीत...जाओ रे जोगी तुम जाओ रे,नील गगन की छांव में दिन रैन गले से मिलते है,कसक ये दिन रात की,तुम्हे याद करते करते आदि रचित हो सके जिसकी कल्पना तक अन्य संगीतकार कभी भी नही कर सकते।आजकल RDB व ऐ. आर.रहमान पर हमारा मीडिया ज्यादा मेहरबान नज़र आता है किंतु उनके कार्यक्रमो को देखने के बाद निराशा ही हाथ लगती है क्योंकि इन कार्यक्रमो को प्रस्तुत करने वाले नाटकीयता की हदे पार कर जाते है।एक टेबल पर तीन व्यक्ति झूंठे आंसूं बहाते है,विस्मय से देखते है,शानदार वस्त्र धारण कर खड़े होकर बेमकसद की तालियां बजाते है।रोशनी की आड़ में शोर ही शोर और जोर से बोलना इन संगीत पंडितो की आदत होती है।मेने SJMF के कार्यक्रम संख्या 22,23,24 व 25 में लगातार शिरकत की ओर जिन कलाकारों को स्टेज पर सुना उन्होंने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया किन्तु जब इन्ही कलाकारों को अन्य संगीतकारो के कार्यक्रमो में सुना तो बेहद निराशा हाथ लगी?इसमे कलाकारों का दोष नहीं अपितु भावना की बात है!शंकरजयकिशन के गीतों को वो भावनात्मक रूप से गाते है क्योंकि वह गीत ही भावना प्रधान है उनमें संगीत का मूल तत्व है किंतु दूसरे संगीतकारो के गीतों में भावना नही अपितु चालुपन होता है अतः उनके गायन का स्तर ही घट जाता है। शंकरजयकिशन को याद करते करते सारी उम्र जा रही है किंतु भगवान् का शुक्र गुजार हूँ कि शांति से जीवन व्यतीत हो रहा है।उत्तम संगीत जहाँ स्वस्थ रखता है वही परमात्मा तक पहुँचने काउत्तम मार्ग है जिसके पथ प्रदर्शक शंकरजयकिशन है। Shyam Shanker Sharma. Jaipur,Rajasthan.