तेरी खुशबू
मेरे आसपास थी वह एक खुशबू सुबह से एकदम बेचैन जो थी मैं सब कुछ तो खत्म कर चुके थे तुम और मैंने भी तुम्हारे लिए हां की थी। फिर भी मन अशांत था घर में कोई न होने के बावजूद एक कोलाहल-सा था मैं इस कमरे से उस कमरे तक चक्कर काट रही थी। सुन्न था दिल मेरा और आंखें आंसू बहा रही थी। मैं कभी पानी गर्म करने रख रही थी, तो उसे कभी बस बहा रही थी कुछ तो था, जिसकी वजह से यह हरारत थी। तुम छोड़ चुके थे मुझे मेरी राह भी अधूरी थी। फिर भी कुछ था, जो बेचैन थी मैं तुम्हारे तोहफे भी एक बैग में रखे थे मैंने और खुद से वादा किया था तुम्हारे जाने के बाद वो भी छोड़ दूंगी जो तुमने मुझे दिया था। जब सब कुछ लौटा दिया फिर क्यों मैं बेचैन थी? शायद, तुम्हारी आदत,तुम्हारी यादें, तुम्हारी डांट तुम्हारा प्यार, तुम्हारी नाराजगी, तुम्हारा गुस्सा, हंसना और मुझे रुला देना, सब कुछ मेरे पास रह गया था। मैं इधर-उधर झांक रही थी। एक टूटी रूह भी सुबक रही थी। मैं लेटी थी और सेच रही थी, क्यों इतना बेचैन हो रही थी। कुछ तब भी पास था मेरे,यह उसकी ही घबराहट-सी थी। जब थक-हारकर बैठ गई मैं रोते-रोते भी थक गई मै। फिर भी इधर-उधर जो झांक रही थी मालूम चला वो खुशबू तेरी थी जिसकी वजह से बेचैन थी मैं।
-अंकिता बंगवाल







