कैसे शुरू हुई परिवार की राजनीति – विजय मिश्रा से ऋषि मिश्रा तक
बिहार की राजनीति में परिवारवाद की जड़ें गहरी हैं, और इसका एक प्रमुख उदाहरण है विजय कुमार मिश्रा और उनके बेटे ऋषि मिश्रा की कहानी। विजय मिश्रा, जो बीजेपी के विधायक थे, ने 2014 में सुपौल विधानसभा सीट से इस्तीफा दे दिया ताकि उनका बेटा ऋषि जाले सीट से उपचुनाव लड़ सके। यह घटना मई 2014 की है, जब विजय मिश्रा ने नीतीश कुमार की प्रशंसा करते हुए इस्तीफा दिया, जिसे राजनीतिक हलकों में परिवारवाद का स्पष्ट उदाहरण माना गया। ऋषि मिश्रा, जो पूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा के पोते हैं, ने जेडीयू के टिकट पर जाले से उपचुनाव जीता। लेकिन क्या यह पिता का त्याग था या सत्ता को परिवार में बनाए रखने की रणनीति? यह परिवारवाद बिहार की राजनीति में नया नहीं है। ललित नारायण मिश्रा इंदिरा गांधी के समय रेल मंत्री थे, और उनका परिवार दशकों से राजनीति में सक्रिय है। विजय मिश्रा ने बीजेपी से इस्तीफा देकर जेडीयू का साथ दिया, और ऋषि की एंट्री हुई। लेकिन जाले के मतदाताओं को सोचना चाहिए: क्या ऐसे नेता, जो परिवार की विरासत पर निर्भर हैं, वाकई जनता की सेवा कर पाएंगे? 2014 में यह switch राजनीतिक opportunism का प्रतीक बन गया, जहां पार्टियां बदलना आसान हो गया। आज, 2025 के चुनाव में ऋषि फिर जाले से लड़ रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के टिकट पर, जबकि वे हाल ही में आरजेडी में थे। यह दिखाता है कि परिवारवाद और opportunism कैसे जुड़े हैं। जाले के लोग पूछें: क्या राजनीति सेवा है या पारिवारिक व्यवसाय?












