घबराहट
घबराहट थी कोई आहट थी डर था तो तुझको खोने का खुश था एक पल एक पल था हँसा डर था तो सदियों रोने का मेरी चाहत थी तेरे वादे थे कोई कारण तो था मिलने का कहीं खुशबू थी कोई फूल खिला था भय था तो मुरझा जाने का मेरा मन ना था तुझे जाना था डर था तो लौट ना आने का कुछ यादें थी मैं आहत था डर था तो फिर ना चहकने का मैं खुश होता कैसे तेरे अंदर कोई खालीपन था तू फूल था मैं पेड़ ना था डर था तेरे फिर ना महकने का खुश था एक पल एक पल था हँसा डर था तो सदियों रोने का
















