ज़िंदगी नाम है कुछ लम्हों का, और उन में भी वही इक लम्हा जिस में दो बोलती आँखें चाय की प्याली से जब उट्ठीं तो दिल में डूबीं
- Kaifi Azmi
बस यूँही बैठे रहो, हाथ में हाथ लिए ग़म की सौग़ात लिए, गर्मी-ए-जज़्बात लिए
कौन जाने कि उसी लम्हे में, दूर पर्बत पे कहीं बर्फ़ पिघलने ही लगे…
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“तुम्हे पता है चन्दर, बर्फ क्यों गिरती है ?”, पम्मी ने पुछा, “शायद...आसमान का दिल पिघल रहा है”, बहुत ‘सोच-विचार’ करके चन्दर ने जवाब दिया|
“ह्म्म…आसमान का भी दिल पिघलता है!”, पम्मी ने चन्दर की टोपी पर जमी बर्फ को झड़काते हुए पुछा, “और तुम्हारा?”
चन्दर ने बर्फीली वादियों से नज़रें हटाकर पम्मी की ओर कर ली | पम्मी की आँखों में उम्मीद की पतली परतों के मंडराते बादल को देख चन्दर ने उसे अपनी हंसी के झोंके से उड़ा दिया |
“मैं बादल नहीं हूँ पम्मी जी |”










