श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आइए विचार करें...
।। ओ३म् ।।
भाद्रपद के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में ठीक अर्धरात्रि का काल बीतने पर द्वापर के सूर्य धर्मराज योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जी महाराज का माता देवकी के गर्भ से दिव्य जन्म हुआ था, आज उनके जन्म को लगभग पांच सहस्र दो सौ वर्ष से अधिक बीत चुके है। इसी सुअवसर पर यह लेख आप सभी के पठनार्थ प्रस्तुत है। आज समाज में श्रीकृष्ण जी पर अनेकों दोष लगाए जाते हैं, उन्हें मखनचोर, रणछोड़, राधा व गोपियों के संग रास रचना आदि पता नहीं क्या क्या बोला जाता है, लेकिन क्या वास्तव में उनमें ये अवगुण थे वा हमने अपनी मूर्खता के कारण एक योगेश्वर को बदनाम करने का घोर अक्षम्य पाप किया है।
उनके चरित्र जानने हेतु महाभारत का यह प्रकरण अत्यंत द्रष्टव्य है
भीष्म उवाच –
नास्मै देयो ह्यनुनयो नायमर्हति सान्त्वनम् ।
लोकवृद्धतमे कृष्णे योऽर्हणां नाभिमन्यते॥६॥
क्षत्रियः क्षत्रियं जित्वा रणे रणकृतां वरः।
यो मुञ्चति वशे कृत्वा गुरुर्भवति तस्य सः॥७॥
अस्यां हि समिती राज्ञामेकमप्यजितं युधि।
न पश्यामि महीपालं सात्वतीपुत्रतेजसा॥८॥
न हि केवलमस्माकमयमर्च्छतमोऽच्युतः।
त्रयाणामपि लोकानामर्चनीयो महाभुजः॥ ९ ॥
कृष्णेन हि जिता युद्धे बहवः क्षत्रियर्षभाः ।
जगत् सर्वं च वार्ष्णेये निखिलेन प्रतिष्ठितम् ।। १० ।।
तस्मात् सत्स्वपि वृद्धेषु कृष्णमर्चाम नेतरान्।
एवं वक्तुं न चार्हस्त्वं मा ते भूद् बुद्धिरीदृशी ।। ११ ।।
ज्ञानवृद्धा मया राजन् बहवः पर्युपासिताः ।
तेषां कथयतां शौरेरहं गुणवतो गुणान् ॥ १२ ॥
समागतानामश्रौषं बहुन् बहुमतान् सताम् ।
कर्माण्यपि च यान्यस्य जन्मप्रभृति धीमतः ।। १३ ।।
बहुशः कथ्यमानानि नरैर्भूयः श्रुतानि मे ।
न केवलं वयं कामाच्चेदिराज जनार्दनम् ॥ १४ ॥
न सम्बन्धं पुरस्कृत्य कृतार्थं वा कथंचन ।
अर्चामहेऽर्चितं सद्भिर्भुवि भूतसुखावहम् ।। १५ ।।
यशः शौर्य जयं चास्य विज्ञायाच प्रयुज्महे ।
न च कश्चिदिहास्माभिः सुबालोऽप्यपरीक्षितः ।। १६ ।।
गुणैर्वृद्धानतिक्रम्य हरिरर्च्छतमो मतः ।
ज्ञानवृद्धो द्विजातीनां क्षत्रियाणां बलाधिकः ।। १७ ।।
वेदवेदाङ्गविज्ञानं बलं चाभ्यधिकं तथा ।
नृणां लोके हि कोऽन्योऽस्ति विशिष्टः केशवादृते ।। १९ ।।
दानं दाक्ष्यं श्रुतं शौर्यं ह्रीः कीर्तिर्बुद्धिरुत्तमा।
सन्नतिः श्रीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिश्च नियताच्युते ।। २० ।।
(महाभारत सभापर्व अध्याय 38)
भीष्मजी ने कहा- धर्मराज! भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत्में सबसे बढ़कर हैं। वे ही परम पूजनीय हैं जो उनकी अग्रपूजा स्वीकार नहीं करता है, उसकी अनुनय-विनय नहीं करनी चाहिये। वह सान्त्वना देने या समझाने-बुझानेके योग्य भी नहीं है। जो योद्धाओं में श्रेष्ठ क्षत्रिय जिसे युद्धमें जीतकर अपने वशमें करके छोड़ देता है, वह उस पराजित क्षत्रियके लिये गुरुतुल्य पूज्य हो जाता है। राजाओंके इस समुदायमें एक भी भूपाल ऐसा नहीं दिखायी देता, जो युद्धमें देवकीनन्दन श्रीकृष्णके तेजसे परास्त न हो चुका हो। महाबाहु श्रीकृष्ण केवल हमारे लिये ही परम पूजनीय हों, ऐसी बात नहीं है, ये तो तीनों लोकोंके पूजनीय हैं। श्रीकृष्णके द्वारा संग्राममें अनेक क्षत्रियशिरोमणि परास्त हुए हैं। यह सम्पूर्ण जगत् वृष्णिकुलभूषण भगवान् श्रीकृष्णमें ही पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है अर्थात् इस जगत में सब श्रीकृष्ण का ही अनुसरण करते हैं, उन्हीं को प्रमाण मान कर उनके बताए मार्ग पर चलते हैं। इसीलिये हम दूसरे वृद्ध पुरुषोंके होते हुए भी श्रीकृष्णकी ही पूजा करते हैं, दूसरों की नहीं। राजन्! तुम्हें श्रीकृष्णके प्रति वैसी बातें मुंहसे नहीं निकालनी चाहिये थीं। उनके प्रति तुम्हें ऐसी बुद्धि नहीं रखनी चाहिये। मैंने बहुत-से ज्ञानवृद्ध महात्माओंका संग किया है। अपने यहाँ पधारे हुए उन संतोंके मुखसे अनन्तगुणशाली भगवान् श्रीकृष्णके असंख्य बहुसम्मत गुणोंका वर्णन सुना है। जन्मकालसे लेकर अबतक इन बुद्धिमान् श्रीकृष्णके जो-जो चरित्र बहुधा बहुतेरे मनुष्योंद्वारा कहे गये हैं, उन सबको मैंने बार-बार सुना है। चेदिराज ! हमलोग किसी कामनासे, अपना सम्बन्धी मानकर अथवा इन्होंने हमारा किसी प्रकारका उपकार किया है, इस दृष्टिसे श्रीकृष्णकी पूजा नहीं कर रहे हैं। हमारी दृष्टि तो यह है कि ये इस भूमण्डलके सभी प्राणियोंको सुख पहुँचानेवाले हैं और बड़े-बड़े संत महात्माओंने इनकी पूजा की है। हम इनके यश, शौर्य और विजयको भलीभाँति जानकर इनकी पूजा कर रहे हैं । यहाँ हुए लोगों से कोई छोटा-सा बालक भी ऐसा नहीं है, जिसके गुणोंकी हमलोगों ने बैठे पूर्णतः परीक्षा न की हो । श्रीकृष्णके गुणको ही दृष्टिमें रखते हुए हमने वयोवृद्ध पुरुषका उल्लंघन करके इनको ही परम पूजनीय माना है। ब्राह्मणोंमें वही पूजनीय समझा जाता है, जो ज्ञानमें बड़ा हो तथा क्षत्रियों में वही पूजाके योग्य हैं, जो बलमें सबसे अधिक हो। इनमें वेद-वेदांगका ज्ञान तो है ही, बल भी सबसे अधिक है। श्रीकृष्णके सिवा संसारके मनुष्योंमें दूसरा कौन सबसे बढ़कर है? दान, दक्षता; शास्त्रज्ञान, शौर्य, लज्जा, कीर्ति, उत्तम बुद्धि, विनय, श्री, धृति, तुष्टि और पुष्टि- ये सभी सद्गुण भगवान् श्रीकृष्णमें नित्य विद्यमान हैं।
इसको पढ़ने के बाद हमें पता चलता है कि कृष्ण जी पर राधा व गोपियों के संग रास रचाने, माखन चुराने आदि सब झूठे आक्षेप दुष्टों कृष्ण जी पर लगाया है, अतः स्वयं को श्रीकृष्ण के भक्त कहने वाले श्री कृष्ण जी को बदनाम करना त्याग देवें।
श्रीकृष्ण के गुणों को देखते हुए ऋषि दयानन्द कहते हैं
देखो, श्री कृष्ण का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है; उनका गुण, कर्म, स्वभाव, चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश है; जिसमें, श्री कृष्ण ने जन्म से मरणपर्यन्त कोई अधर्म का आचरण कुछ भी किया हो, ऐसा नहीं लिखा।
(सत्यार्थ प्रकाश एकादश समुल्लास)
पूर्वपक्ष - श्रीकृष्ण समर्थ पुरुष थे, उन्हें यह सब करने में दोष नहीं आता।
सिद्धान्तपक्ष - आपका यह कथन युक्तियुक्त नहीं। यदि समर्थ पुरुष ऐसा कार्य करे तो उसे सर्वाधिक दोष लगता है, क्योंकि उसके गलत कार्य करने से सारा समाज गलत मार्ग पर चलेगा और सबको पथभ्रष्ट करने का वह दोषी होगा।इसीलिए स्वयं योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
(गीता 3/21)
अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं; वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है, लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।
शिशुपाल श्रीकृष्ण जी से अत्यंत द्वेष करता था, वह भी उनमें दोष नहीं दिखा पाया, किंतु आज के उनके तथाकथित भक्त उनपर दिन रात अनेकों दोष मड़ते रहते हैं। अतः आइए इस जन्माष्टमी मिलकर इस सत्य पर विचार करें तथा यह प्रण लें कि हम उनके वास्तविक स्वरूप को ही स्वीकार करेंगे। ईश्वर हम सभी को सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग करने की सद्बुद्धि व सामर्थ्य दे, इसी कामना के साथ हम अपनी लेखनी को विराम देते हैं।
– यशपाल आर्य














