जब पहचान साबित करनी पड़े: क्या हमारा लोकतंत्र नागरिक पर भरोसा करता है या उससे प्रमाण मांगता है?
क्या हमारा लोकतंत्र कागज़ पर मजबूत है, या ज़मीन पर?जब प्रक्रिया नागरिक से बड़ी होने लगे – SIR के बहाने एक कठिन सवाल हम अक्सर यह मानकर चलते हैं कि लोकतंत्र सुरक्षित है।क्योंकि चुनाव होते हैं। वोट डाले जाते हैं। सरकारें बदलती हैं। लेकिन एक छोटा-सा सवाल है —क्या लोकतंत्र सिर्फ चुनाव होने से बचा रहता है,या इस बात से कि हर वह व्यक्ति, जिसे वोट देना चाहिए,वह वास्तव में वोट दे पा रहा है? कल्पना कीजिए…













