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Book of the day: No Matter The Wreckage by Sarah Kay
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Why am I so short #allaboutwork #worknfun #chefs #chefawards #chefawardsdinner #foodlover #amazingfood (at Hotel Ashok)
Book of the day: The Book Thief by Markus Zusak
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The perfect kiss
And while they kissed, She could not stop smiling,
He felt it on his lips, It was perfect for her,It felt so right.
And today, when he is gone,She still wonders what it meant.
आज मैं सबको बताती हूँ की मैं दलित हूँ
रोहिथ वेमुळे, एक दलित पीएचडी छात्र जिसने 18 जनवरी को अपनी ज़िन्दगी देकर आत्महत्या कर ली, तारों की बातें करता था. उसका दिमाग भी मानो एक जादुई धुल से बना था. जिसकी छाप वो अपने आखिरी खत में हमेशा के लिए छोड़ गया.
उसका जीवन, जिसमे वो इतना आगे तक पढ़ पाया और जिसकी फीस उसकी माँ ने लोगों के कपड़े सिल कर भरी थी, अपने आप में एक बगावत था. अपनी मौत में भी वो दलित अधिकार की एक ऐसी मशाल छोड़ गया, जिसकी लौ सबकी आँखों में कौंध सी गयी. मीडिया की, सरकार की, अफ़सर शाही की, और मेरी।
मेरा जन्म राजस्थान के अजमेर ज़िले के एक दलित घर में हुआ था. और मैंने इस बात को छुपाकर कर बढ़े होना सीखा. मेरी कान्वेंट स्कूल की पढ़ाई, मेरा नकली जात नाम और रंग, जो “गेहुआ होकर भी गंदा नहीं” था, इन सबने मिलकर मुझे मेरी कास्ट छुपाने में मदद की. “बेटा, वैसे आप क्या हो? "आंटी, ब्राह्मिन”. यह झूठ मैंने इतना बार इतनी सफाई से बोला कि मैंने अपनी दोस्तों की माओं को तो क्या, खुद को भी उसे सच मानने पर मजबूर कर दिया. मगर मैं अपनी शर्मिंदगी को मजबूर नहीं कर पायी, वो जो हर बार मेरे चेहरे पर शर्म की छाप छोड़ जाती, जब भी कोई कॉस्ट, कोटा या भंगियों के बारे में बात करता। भंगी - वो लोग जो हज़ारों सालों से दूसरो के घरों में जाकर उनकी घिन उठाने का काम करते रहे थे. भंगी - एक गाली जो दूसरी जाती के लोग एक-दूसरे को यूं ही दे दिया करते हैं. भंगी - एक दलित जात जो मेरी भी जात हैं.
“इस बार उन्हें पता चल जायेगा” ये ख्याल मेरे ज़ेहन में कई बार आया. एक बार तब, जब मेरे कॉलेज ने मेरा नाम कोटा की लिस्ट में डाल दिया था. और एक बार तब भी, जब मेरी नौकरी की शुरुवात में उन्होंने मुझे बिर्थ सर्टिफिकेट जमा करने के लिए बोला।और कुछ लोगों को पता चला भी, कुछ को नहीं. कुछ को कोई फर्क नहीं पड़ा और जिन्हे पढ़ा - जिनमें से एक मेरी स्कूल की दोस्त भी थी, जिसके माँ बाप के पूछने पर, मैंने पहली बार अपनी अस्ली कास्ट बता दी थी - उन्होंने मुझसे बात करना बंद कर दिया. मगर उन्हें पड़ा हो या नहीं, फर्क मुझे हमेशा पड़ा. मुझे इतना फर्क पड़ा की मैंने अपनी कास्ट छुपाने की लिए कई झूठ बोले. और उनको छुपाने के लिए और झूठ बोले. बढ़ी आसानी से मैं अपना जात नाम, जो मेरे दादा ने 60 साल पहले ही अपने नाम से हटा दिया था, भुला चुकी थी. वो नाम था निदनिया।
और मैं उसे तब तक भूली ही रही जब तक मैंने रोहिथ का फेसबुक नहीं देखा. जब तक मैंने यह नहीं देखा की किसी वजह से, मरने से कई दिन पहले उसने मुझे ऐड करने की कोशिश की थी. और उसे न जानते हुए मैंने उसे डिलीट कर दिया था. किस वजह से उसने मुझे ऐड करना चाहा? शायद उसने मेरा नाम कुछ दलित ग्रुप में देखा हो और मुझ तक पहुँचने की कोशिश की हो.
और उसकी वो कोशिश कामयाब भी हो गयी. उस कोशिश की कामयाबी इसमें थी की उसने मुझे ‘बाहर आने’ पर मजबूर कर दिया. वो भी उन लोगों के सामने जिन की बीच मैं छुपकर अपने आप को तमाम ज़िन्दगी छुपाती रही. उसने मजबूर कर दिया मुझे यह महसूस करने पर की मेरा इतिहास शर्म की नहीं, बल्कि ज़ुल्म की ईटों पर बना है. मजबूर कर दिया यह याद करने पर की मेरे बढ़े दादा ने मिटटी में डंडी घुमाकर लिखना सीखा था. क्यूँकी उनके दूसरी जाती के टीचर ने उन्हें स्लेट नहीं पकड़ने दी थी. और उसने मुझे एक और चीज़ करने पर मजबूर कर दिया - खुद पर गर्व.
और मैं जानती हूँ की मैं अकेली नहीं हूँ. हम जैसे बहुत सारे हैं जिनको समाज दलित होने पर शर्म महसूस करने को विवश करता है. हमें शर्म की वो विवशता सुनने और सुनाने की ज़रुरत है. इसलिए मैंने dalitdiscrimination.tumblr.com. की शुरुआत की है. एक ऐसी जगह जहाँ हम बिना झझक और बिना शर्म के, अपने दलित होने के बारे में बात कर सकते हैं. जहाँ हम कोटा, रिजर्वेशन और काबिलियत से आगे बढ़कर, अपनी खुद की और अपनी कहानियों की बात कर सकते हैं. सुन सकते हैं वो आवाज़ें जो अब तक दबी, दली और अनसुने खून की आसूं रोने पर मजबूर रहीं हैं. और हम सुन, कह सकते हैं कहानियाँ अपने गर्वे की, अपने इतिहास की, और अपनी उन कहानियों के प्रभुत्व की. और हम बात करें जातिवाद के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मिक हानि की. ताकि हर कोई यह जान ले, की रोहिथ का जन्म (जैसा वो अपने खत में लिख गया) कोई हादसा नहीं था.
- याशिका दत्त (निदनिया)
Adding the hindi translation of my initial note.
When you get to meet the finest Pakistani artist...totally mesmerized..#Humsaya #PakistanTheaterFestival #creatingChavi #ChaviPR
Winter Wind
The stubborn chilly wind blew pompously, Carrying dry yellow leaves along. They hugged dust as if to mourn at their departure, requesting a reunion with the tree they belonged to. The dust touched me making a denunciation and grief at the same time through my eyes.
And there I kept standing, amidst the winter wind, staring at my cell phone screen, waiting for your name to flash and the phone to ring.