"वैदिक वाङमय में उपनिषद् साहित्य"तथा पाश्चात्य विद्वानों पर इसका प्रभाव
अमूल्य निधि-परिपूरित संस्कृत-साहित्य के वैदिक मन्त्र अनादिकाल से मानव मात्र के लिये मार्गदर्शक रहे हैं। भारतीय संस्कृति के आधार भूत वेदों की अंतिम शब्दराशि ही "उपनिषद्' की संज्ञा से अभिहित है। भारतीय विचारधारा के विकास पथ में उपनिषदों का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यहाँ तक कि भारतीय साहित्य, शिल्प, विज्ञान, दर्शन, कुल धर्म, जातिधर्म, समाजधर्म, राष्ट्रनीति, अर्थनीति, स्वास्थ्यनीति और व्यवहार नीति इस सभी का निर्माण और प्रसार उपनिषद् ज्ञान को मानव जीवन के परम आदर्श के रूप में मान करके ही हुआ है। उपनिषद् ही भारतीय संस्कृति के प्राण स्वरूप है।
उपनिषदों के परिशीलन से परिलक्षित होता है कि “उपनिषद्-साहित्य व उज्ज्वल रत्न है, जिसके आलोक में विज्ञजनों की अंतरात्मा आलोकित हो उठती है। फलतः एक नवीन आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि तथा दार्शनिक तर्क प्रणाली प्राप्त होती है। आत्मा और परमात्मा की एकता सर्वशक्तिमत्ता विलक्षणता तथा महत्ता ही उपनिषदों का वर्ण्य विषय है।
वस्तुतः उपनिषद् साहित्य वह आध्यात्मिक मानस सरोवर है जिससे अनेकानेक सरिताएं निकलकर इस पावन दर्शन भूमि को अवगाहित करती हैं तथा मानव मात्र के ऐहिक कल्याण और आयुष्मिक मंगल का निष्पादन करती हैं। मानव जाति के आध्यात्मिक इतिहास में उपनिषद् साहित्य उस विस्तृत अध्याय की भांति है जो युग-युगान्तर से भारतीय धर्म, दर्शन और जीवन को निरन्तर अनुशासित करता आ रहा है।
भारतीय तथ्य ज्ञान का जितना उत्कृष्ट विवेचन उपनिषदों में मिलता है उतना अन्यत्र कहीं नहीं है। उपनिषदों का गर्भ अनेकानेक रहस्यों से परिपूरित है इसीलिए “इन्हें रहस्यों की उद्भाविका कहा गया है।“1
पवित्र पुस्तकों में उपनिषद् ही वे पवित्र पुस्तकें है जो सर्वाधिक पवित्र तथा उन्नत विचारों को धारण करती हैं।2
अनादि सनातन तथा कालातीत् उपनिषद् यद्यपि वेदशीर्ष या वेदसार है, तथापि वेद से पृथक नहीं है। अतः उपनिषद् वाङमय भी परमेश्वर का निःश्वासभूत है। जीव को कौन कहें परमेश्वर के भी प्रयत्न और बुद्धि का उपयोग उपनिषदों के निर्माण में नहीं हुआ है, अपितु अकृत्रिम, अपौरुषेय, निःश्वासवत्, सहजरूप में उपनिषदें प्रादुर्भूत हुयी हैं। जिनका साक्षात्कार वैदिक ऋषियों द्वारा मंत्र के रूप में किया गया है। इन उपनिषदों का विषय वेदान्त विज्ञान अथवा ज्ञानकाण्ड है।
उपनिषदों के सर्वाधिक अमूल्य विचार वे हैं, जिनकी आधारशिला पर समस्त दार्शनिक परम्परा खड़ी है। औपनिशदिक दर्शन शास्त्रियों की सम्पूर्ण विचारधारा ब्रह्मः आत्मा और मायाका ज्ञान होना परमावश्यक हो जाता है। "पाश्चात्य विद्वान पालऽयूशन ने उपनिषदों की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि भारतीय बौद्धिकता रूपी वृक्ष पर उपनिषदों से अधिक सुन्दर कोई अन्य पुष्पवृत्त नहीं है।"3 उपनिषदें विभिन्न परिस्थितियों से ऊपर उठकर मानव को अन्तः प्रेरित करती है। यद्यपि उपनिषदों में विभिन्न विचारधारा में प्राप्त होती है। फिर भी अन्तोगत्वा सबका उद्देश्य मूलतः एक ही तत्त्व का प्रतिपादन है। जिसे कहीं सर्वोच्च सत्ता तथा कहीं आत्मा या ब्रह्मा की संज्ञा प्रदान की गयी है।
इस प्रकार सुस्पष्ट है कि उपनिषद् "वेद" का ज्ञान काण्ड है। यह वह चिर प्रदीप्त ज्ञान दीपक है जो सृष्टि के आदिकाल से प्रकाश देता चला आ रहा है, और लयपर्यन्त पूर्ववत प्रकाशित रहेगा इसके प्रकाश में अमरत्त्व है, जिसने सनातन धर्म के मूल का सिंचन किया है। वह जगतकल्याणकारी भारत की अपनी निधि है। जिसके सम्मुख विश्व का प्रत्येक स्वाभिमानी राष्ट्र श्रद्धा से नतमस्तक रहा है और सदैव रहेगा। अपौरुषेय वेद का अन्तिम अध्याय रूप यह उपनिषद ज्ञान का आदिस्रोत और विद्या का अक्षय भण्डार है। वेद विद्या के चरम सिद्धान्त "नेह नानास्तिं किञ्चन..........................।।" कठोपनिषद् 2/1/11/
इस तथ्य का प्रतिपादन करते हुए यह उपनिषद् जीव को अल्पज्ञता से सर्वज्ञता की ओर जगत के त्रिविध दुःखों के एकान्तिक आत्यान्तिकानन्द की ओर तथा जन्म मृत्यु बन्धन से अनवतर स्वातन्त्र्यमय शाश्वत शांति की ओर ले जाती है।
'वेद' भारतीय ज्ञान विज्ञान के उद्गम केन्द्र हैं। इनके महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक शब्दों का विस्तार उपनिषदों में हुआ है। अर्थात् वैदिक संहिताओं में यत्र-तत्र जो बिखरे हुये महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक तत्त्व दिखलाई देते हैं उन्हीं उपलब्ध तत्त्वों के आधार पर बाद में औपनिषद् को "श्रुति" भी कहा जाता है।
संहिता ब्राह्मण, आख्यक तथा उपनिषद् के भेद से वेद के चार विभाग माने गये हैं। इनमें अन्तिम विभाग उपनिषद् साहित्य ही "वेदान्त" के नाम से जाना जाता है। वैदिक शिक्षा का मुख्य लक्ष्य इन्हीं उपनिषद् ग्रन्थों में ही समुपलब्ध होता है तथा विभिन्न दार्शनिक समस्याओं का समाधान भी प्राप्त होता है। अतः इनका कथन अन्त में ही अपेक्षित था । श्वेताश्वतरोपनिषद्के अनुसार "वेदान्त शब्द रहस्यात्मक ज्ञान का बोधक है।4
ज्ञातव्य है कि उपनिषदों के पूर्व वैदिक दार्शनिक-चिन्तन पद्धति उपनिषदों जैसी नहीं थी। यही कारण है कि संहिताओं में यत्र तत्र संक्षिप्त रूप में ही इन विचारों का प्रस्फुटन दृष्टिगोचर होता है। वैसे कहीं-कहीं दार्शनिक तथ्यों का विकसित स्वरूप भी देखने को मिलता है। जैसे नासकीय सूक्त5, पुरुष सूक्त6, हिरण्यगर्म सूक्त7, वाकसूक्त8 तथा शिव संकल्प सूक्त9 इत्यादि।
ऋग्वैदिक मंत्र “एक सद्धिप्रा वहुधावदन्ति । अग्निं यम मातरिष्वान माहः, के माध्यम से ऋषि उस परमसत्ता की ओर संकेत करता है जिसका उपनिषदों में भिन्न-भिन्न रूपों में उद्घोष किया गया है, जैसे – “ईशावास्यामिदं सर्वम् यात्विञ्च जगत्यां जगत"11 "आत्मैवेदं सर्वम"12 तथा "सर्व रवात्विदं ब्रह्मा"13 इत्यादि।
ऋग्वेदस्य नासकीय सूक्त में ब्रह्म के उस स्वरूप का वर्णन किया गया है जो सभी वस्तुओं का अन्तस्तत्व है। किन्तु स्वतः अवर्णनीय है।
"नासदासीन्नो सदासीत् तदान्तिं । नासीद्रजोतो चोयापरोयत्।। 14
अर्थात् जो कुछ था वह पहले नहीं था। न पृथ्वी थी न आकाश था और न उसके परे स्वर्ग लोक ही था। कहने का तात्पर्य यह है कि उस परम् ब्रह्म के परे भी नहीं था। इसी सूक्त के एक मंत्र में सृष्टि के उद्भव एवं ज्ञान के प्रति जिज्ञासा व्यक्त करते हुए ऋषि कहता है कि- इयं विसृष्टिर्यत् आवभूव यदिवादधे यदि वा न ।
यो अस्याध्यक्षः परमेत्योग्न्त्सो अड्ग वेद यदि वानवेद।।15
अर्थात् - यह सृष्टि जिससे उत्पन्न हुई है, उसने इसे बनाया या नहीं बनाया। तबसे उच्च लोक में, जो इसका अध्यक्ष है, वह इसे जानता है, वह भी नहीं जानता।
सृष्टि के आदि में मौलिक तत्व के संदर्भ में इस सूक्त में उल्लिखित है कि-
"अनादिवातं स्वध्या तदेकं । तस्माद्वन्यन्न परः किंचनास।।16
अर्थात् – उस समय एक ही तत्व था, जो हवा के बिना भी श्वास लेता था तथा
अपनी स्वाभाविक शक्ति से जीवित था।
दार्शनिक महत्व की दृष्टि से ऋग्वेद संहित का "पुरुषसूक्त" भी अत्यंत प्रसिद्ध हैं इस सूक्त में प्रस्फुटित विचार उपनिषद् चिन्तन की आधार शिला है। इसमें आध्यात्मिक कल्पना का जो भव्य निदर्शन होता है। वह अन्यंत्र सर्वत्र दुर्लभ है, परम्पुरुष की सर्वव्यापक्ता और महत्ता का एक ज्वलन्त ‘रूप अन्यंत्र देखने को नहीं मिलता। यहाँ पर परम्पुरुष को असंख्य शिरों, असंख्य पादों तथा असंख्य नेत्रों वाला बताया गया है। इसी परम्पुरुष को ही अमरतत्व का स्वामी तथा कार्य-कारण दोनों का नित्य है। इस ब्रह्माण्ड में जो कुछ है। होगा, वह सब परम्पुरुष ही है। जितने भी जीव हैं, सबमें वहीं है। इस पुरुष की महिमा अनन्त और असीम है यह सम्पूर्ण विश्व उसी से व्याप्त है।17
इसके अतिरिक्त ऋग्वेद संहिता का हिरण्यगर्भ गर्भसूक्त तथा वाकसूक्त भी अपनी दार्शनिक गम्भीरता के कारण नितान्त प्रसिद्ध हैं। दृिख्यगर्भ के सन्दर्भ में अपनी विचिकित्सा प्रकट करते हुए ऋषि कहता है- “हिरण्यगर्भ (प्रजापति) सर्वप्रथम उत्पन्न हुआ और उत्पन्न होते ही सम्पूर्ण प्राणियों का अद्वितीय स्वामी हो गया तथा उसने इस पृथ्वी और धुलोक को धारण किया। (उसे छोड़कर) हम किस देवता के लिये छवि का विधान करें।"18
इस प्रकार यजुर्वेद संहिता और अथर्ववेद संहिता में भी औपनिषद् चिन्तन के मूलतत्व दृष्टिगोचर होते हैं। यजुर्वेद संहिता का चालीसवें अध्याय ही ईशावास्योपनिषद के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर आत्मा की व्यापकता को दर्शाते हुये कहा गया है कि वह आत्मा सर्वत्र व्याप्त है। दीप्तिमान है: शरीर से असम्पृक्त तथा प्राणों से रहित है। वह नाडियों से रहित, शुद्ध और पापों से वर्जित है। वह सर्वदृष्टा मनीषी, सर्वोत्कृष्ट तथा स्वयम्भू है। उसके द्वारा सृष्ट पदार्थों में सदा से ही औचित्य का आधार बना हुआ है।19
अथर्ववेद संहिता में दार्शनिक सूक्तों का बाहुल्य है। उपनिषदों में प्रयुक्त सर्वाधिक महत्व का शब्द "ब्रह्मन" परमपुरुष के रूप में अनेकशः वर्णित है। जिसका उपनिषदे बार-बार वर्णन करती है अन्य वैदिक संहिताओं में "ब्रह्मन" शब्द का प्रयोग मंत्र या प्राथना के अर्थ में हुआ है। शतपथ ब्राह्मण का स्पष्ट कथन है- "ब्रहन वै मन्त्रे:20
ब्रह्म के स्वरूप तथा उसकी महत्ता को व्यक्त करते हुये अथर्वसंहिता में कहा गया है कि "ज्ञानियों द्वारा ज्ञेय और उपासनीय तथा पृथ्वी से अन्तरिक्ष पर्यन्त व्याप्त उस परम ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए।
"डॉ० एस० राधाकृष्णन् के अनुसार" वैदिक सूक्तों में सन्निहित दार्शनिक प्रवृत्तियों का विकास उपनिषदों में ही हुआ। इन्हीं विचारों के पोषक महर्षि अरविन्द जी लिखते हैं" उपनिषदें वैदिक मंत्र और उनके स्वभाव तथा मूलभूत विचारों से क्रांतिकारी रूप में पृथक नहीं है, अपितु ये उनके विस्तार तथा विकास की ही साक्षात् प्रतिमूर्ति है।
पाश्चात्य विद्वानों पर उपनिषदों का प्रभाव:- उपनिषदों के गूढ़तम तथा सार्वभौमिक सिद्धान्तों से प्रत्येक विद्वान प्रभावित हुआ है। चाहे वह किसी भी देश का अथवा किसी भी धर्म का अनुयायी क्यों न हो। यही कारण है कि मानव मात्र से जो सम्मान उपनिषदों को प्राप्त हुआः वह किसी अन्य धर्मग्रन्थ को प्राप्त न हो सका।
विदेशी विद्वान उपनिषदों में बहुत से ऐसे प्रश्नों का समाधान पाकर आश्चर्य चकित हो गये, जिनका उत्तर अन्य धर्मों तथा दर्शनों में उन्हें या तो मिला ही नहीं था, या तो सन्तोष जनक नहीं था, उदाहरणार्थ- ब्रह्म अथवा ईश्वर का स्वरूप क्या है। जीवात्मा किस तत्व से बना है ? संसार की रचना किस तत्व से हुयी है जीव की स्वर्ग या नर्क में स्थिति कितने काल तक रहती है, मरने के बाद क्या होता है ? देह की रचना के पूर्व देही का अस्तित्व था या नहीं? कुछ लोग जन्म से ही सुखी या दुःखी क्यों होते हैं ? इत्यादि प्रश्नों का उत्तर उपनिषद् ग्रन्थों में इतना वैज्ञानिक तथा सन्तोषप्रद है कि प्रत्येक जिज्ञासु के मन पर अपनी अमिट छाप छोड़े बिना नहीं रह सकता। यही कारण है कि केवल भारतीय मनीषियों ने ही मुक्तकण्ठ से प्रशंसा नही की है :-अपितु विधर्मी और विदेशी विद्वानों ने भी इसकी महत्ता तथा सर्वोपदेयता को निःसंकोचभाव से स्वीकार किया है। इन विद्वानों में शापेनहावर, मैक्समूलर, पाल डयूसन, मैक्डानल ह्यूम, आर्क, काजिन्स, लेगल, हक्सले, ब्लूमफील्ड, श्रीमती एनी बेसेन्ट, ए० बी० कीथ, ओल्टायेयर, ओल्डेन वर्ग, ए० डी० गफ, जी० एच० लोगले, मैकेन्जी, स्टेटर इत्यादि के नाम विशेष उल्लेखनीय है। कुछ प्रमुख पाश्चात्य विचारकों के उपनिषद सम्बन्धी विचार निम्नलिखित है-
जर्मन विद्वान शापेनहावर उपनिषदों की प्रशंसा करते हुये लिखते हैं कि “सम्पूर्ण विश्व में उपनिषदों के समान जीवन को ऊँचा उठाने वाला कोई दूसरा अध्ययन का विषय नहीं है। उनसे मेरे जीवन को शान्ति मिली है, इन्हीं से मुझे मृत्यु में भी शान्ति मिलेगी।" 22 शापेनहावर के इन शब्दों को उदधृत करते हुये प्रो० मैक्समूलर ने लिखा है कि - शापेनहावर के इन शब्दों के लिये यदि किसी समर्थन की आवश्यकता हो तो अपने जीवन भर के अध्ययन के आधार पर मैं इनका प्रसन्नतापूर्वक समर्थन करूँगा।23 शापेनहावर महोदय की स्पष्ट घोषण है कि ये सिद्धान्त ऐसे हैं जो एक प्रकार से अपौरुषेय ही हैं। ये जिनके मस्तिष्क की उपज है उन्हें मनुष्य मात्र कहना कठिन है।
जर्मन विद्वान पाल डयूशन से उपनिषदों का मूलतः संस्कृत अध्ययन करने के पश्चात लिखा है कि उपनिषदों के भीतर जो दार्शनिक कल्पना है, वह भारत में तो अद्वितीय है ही, सम्यवतः सम्पूर्ण विश्व में अतुलनीय है।24 डयूशन महोदय की स्पष्ट घोषणा है कि-
काण्ट और शापेनहावर के विचारों की उपनिषदों ने बहुत कल्पना कर ली थी तथा सनातन दार्शनिक सत्य की अभिव्यंजना, मुक्तिदायनी आत्मविद्या के सिद्धान्तों से बढ़कर निश्चयात्मक प्रभावपूर्ण रूप से कदाचित ही कही हुयी हो।25
मैक्डॉनल का कथन है कि:- मानवीय चिन्तन के इतिहास में सबसे वृहदाख्यकोपनिषद् में ही ब्रह्म अथवा पूर्णतत्व को ग्रहण करके इसकी यथार्थव्यंजना हुयी है।200 डयूशन महोदय ने तो यहाँ तक लिखा है कि मैं भारत की यात्रा पर गया था, वहाँ मैने बहुत कुछ पाया, परन्तु मैने वहाँ जो सबसे बहुमूल्य विभूति प्राप्त की है वह है - पवित्र संस्कृत भाषा में ऋषियों के दिव्य ज्ञान से ओत-प्रोत "उपनिषेद" 26
ह्यूम महोदय के अनुसार सुकरात अरस्तु अफलातून आदि कितने ही दार्शनिकों के ग्रन्थ मैने ध्यानपूर्वक पढ़े: परन्तु जैसे शक्तिमयी आत्मविद्या उपनिषदों में पाया वैसी कही अन्यत्र देखने को नहीं मिली।27
डी० जी० आर्क ने उपनिषदों की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि मनुष्य की आत्मिक मानसिक और सामाजिक गुत्थियों किस प्रकार सुलझ सकती हैं। इसका ज्ञान उपनिषदों में ही मिल सकता है। यह शिक्षा इतनी सत्य शिव और सुन्दर है कि आत्मा की गहराई तक उसका प्रयोग प्रवेश होता है। जब मनुष्य सांसारिक दुःखों से और चिन्ताओं से घिरा हो, तो उसे शान्ति और सहारा देने के अमोद्य साधन के रूप में उपनिषदें सहायक हो सकती हैं।28
सन् 1944 बर्लिन में थ्री शेलिंग महोदय के उपनिषद सम्बन्धी व्याख्यान को सुनकर प्रसिद्ध प्रो० मैक्समूलर अत्यन्त प्रभावित हुये तथा अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुये अपनी पुस्तक (द उपनिषद्) में लिखें-उपनिषद् प्रतिपादित वेदान्त धर्म ही सम्पूर्ण पृथ्वी का धर्म होगा, यही मनीषियों की भविष्यवाणी है।29
इस प्रकार सुस्पष्ट है कि न केवल भारतीय मनीषियों ने ही नहीं, अपितु पाश्चात्य मनीषियों ने भी औपनिदिक तथ्यों को मुक्तकण्ठ से स्वीकार किया है अपवाद रूप में कुछ पाश्चात्य विद्वानों को रखा जा सकता है जिन्होंने न केवल उपनिषदों की अपितु सम्पूर्ण वैदिक वाङमय की निन्दा की है इसका प्रमुख कारण उन महामहिम विद्वानों को ओछी (निम्न) बुद्धि जो उस तत्व तक न पहुँच सकी जहाँ तक पहुँचने में न केवल एक जन्म का अपितु अनेक जन्मों का समय तथा श्रम लगता है।
1- The upnishads contain a secret which is not easy to explore or
unrevealed. The ten upnishads essentally means the secret or
"Rahasya" Studies in the upnishads P.10
2- Alone amont the large number of sacred texts of Hindu religion, the
upnishads have been held a 10p+as specimens of Indian thoughts at
it's highest. The upnishads alone are entitled to respect the true Indian
spirit in the sphere of religion and philosopy (The upnishads Costwoys
3- The tree of the Indian wisdom there is no fairer flower than the upnishads.
- (The Philosophy of upnishads. P.18)
4- वेदान्ते परम गुहनां पुराकल्पे प्रचोदितयं (श्वेताश्वर उपनिषद्) 6122
9- शुक्लयजुर्वेद : माध्यन्दिन वाजसनेय संहित 34/1-611
12- छान्दोग्योपनिषद् : 17/25/2
13- छान्दोग्योपनिषद :13/14/1
17- सहसृर्शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात
स चूमि विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठदशागुलम्पु
रुष एवेदं सर्व-यद्धतं यच्च मध्यम्
उतामृतत्व स्येशानो यदन्नोति रोहति
18- हिरण्यगर्भः सयवर्तताग्ते भूतस्य जातः
पतिरेक आसीत् स दाधार पाथिवी
द्यायुतेयां देवाय हविषा विधेय (ऋग्वेद) : 10/121/1
19- शुक्लयर्जुवेद संहिताः : 140/8
20- शतपथ ब्राह्मण : 7/1/1/1/5/
21- यस्यभूमिः प्रभान्तरिक्षमुतोदरम्
दिवं यश्चक्रे मूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाम ब्राह्मणेनमः
22- "In the whole world there is no study so elovating as that of the upnishads.
It has be neto solace of my life ut will be the solace of my death."
- Sacred book of East P.44
23-"It these word of schopen hour required any confirmation I would willingly
give it as a result of my life long study." The upanishads P.64
24-"Almost superhuman conception whose originato rs can hardly be said
25-"Philosophical conception unequalled in indai, or perhaps any where
clse in the world." - The philosophy of the upanishads P.14
26-"Iternal philosophical truth has scldom found more decisive and suriking
expression then in the doctrine of the emanupating knowledge the Atma:"
27-Bramha or Abslute is grasped and definitely enpressed for the first time
in the history of human thought in the Brihedaranyako-panishad"
A History of Sanskrit literature P.36
28-The Philosophy of upanishads. P.26
29-Dogmas of Buddhism P.25
कर्मयोगी कालेज आफ एजूकेशन मुलिहामऊ, रायबरेली