कोई कह सकता है, ‘माना कि एक दिन में 24 घंटे होते हैं और हम उन्हें बढ़ा नहीं सकते। लेकिन समझ नहीं आता कि यह आदमी एक दिन में चौबीस घंटे का रोना क्यों रो रहा है? मुझे तो एक दिन में चौबीस घंटे जीने में कोई समस्या या मुश्किल नहीं आती। मैं जो करना चाहता हूँ, वह सब करता हूँ और इसके बाद भी अख़बार की पहेलियाँ हल करने का समय निकाल लेता हूँ।
Also read :- stamina kaise badhaye
निश्चित रूप से यह बहुत आसान मामला है। इंसान दिन में चौबीस घंटों में संतुष्ट और सुखी रह सकता है - बड़ी आसानी और आराम से!’ माफ़ करना, दोस्त, मैं माफ़ी माँगता हूँ और मुझे यह बता दें कि आपके चरण कहाँ हैं। आप ही वह महान इंसान हैं, जिससे मैं लगभग चालीस साल से मिलना चाहता हूँ। मेहरबानी करके मुझे अपना नाम-पता बता दें। साथ ही मुझे यह भी बताने की कृपा करें कि आप यह जादू कैसे करते हैं? मैं नाचीज़ आपको कुछ नहीं बता सकता। इसके बजाय आप मुझे अपनी सफलता का रहस्य बताएँ। मेहरबानी करके आगे आएँ। मुझे विश्वास है कि आप संसार में कहीं न कहीं मौजूद होंगे, लेकिन मेरा दुर्भाग्य है कि मैं आज तक आपसे मिल नहीं पाया।
Also read:- HEIGHT KAISE BADHAYE - HEIGHT कैसे बढ़ाये
लेकिन जब तक आप सामने नहीं आ जाते और अपनी सफलता का रहस्य नहीं बता देते, तब तक मैं मुश्किल में फँसे अपने साथियों से बात करना चाहूँगा - उन असंख्य साथियों से, जो इस बात से दुखी हैं कि साल निकलते जा रहे हैं, समय उनकी अँगुलियों से फिसलता जा रहा है और वे अपने जीवन को सही स्थिति में नहीं ला पा रहे हैं। यदि हम समय को लेकर छटपटाहट महसूस करते हैं, तो यह मुख्य रूप से असहजता या बेचैनी की भावना है। हमारी अपेक्षाएँ और आकांक्षाएँ बहुत ज़्यादा हैं, जबकि उन्हें पूरा करने के लिए समय बहुत कम है। इसी कारण हम निरंतर चिंता में रहते हैं। हमारी हर ख़ुशी के आसमान पर चिंता का यह कंकाल मँडराता रहता है। हम टॉकीज़ में फ़िल्म देखते समय हँसते हैं, लेकिन इंटरवल में यह कंकाल हमारी तरफ़ अपनी अँगुली उठाने लगता है। हम आख़िरी ट्रेन पकड़ने के लिए तेज़ी से दौड़ते हैं
और जब ट्रेन लेट हो जाती है और हम प्लेटफ़ॉर्म पर उसका लंबे समय तक इंतज़ार करते हैं, तो यह कंकाल हमसे पूछता है, ‘इतनी भागदौड़ करने के बाद भी तुम्हें क्या मिला? तुम्हारी जवानी कहाँ चली गई? तुम्हारी ज़िंदगी के इतने सारे साल कहाँ चले गए? तुमने अपनी उम्र के साथ क्या किया? तुमने अपने जीवन के साथ क्या किया?’ आप यह कह सकते हैं कि इच्छाएँ जीवन का हिस्सा हैं और अधूरी इच्छाएँ प्रगति के लिए प्रेरित करती हैं। सच है! लेकिन फिर भी अंशों का फ़र्क़ है। मान लें, कोई आदमी मक्का जाना चाहता है। उसकी अंतरात्मा उससे कहती है कि उसे मक्का जाना चाहिए। वह इस इच्छा को पूरी करने की कोशिश करता है और ट्रैवल एजेंसी की मदद से या अपने दम पर यात्रा शुरू कर देता है। इसके बावजूद हो सकता है कि वह कभी मक्का न पहुँच पाए। हो सकता है कि उसका जहाज़ बंदरगाह से चलने के कुछ समय बाद ही डूब जाए। हो सकता है कि वह रेड सी के तट पर मर जाए। हो सकता है कि उसकी इच्छा हमेशा-हमेशा के लिए अधूरी रह जाए। अपूर्ण इच्छा उसे हमेशा सता सकती है। लेकिन यह उसे उस तरह नहीं सताएगी, जिस तरह उस आदमी को सताएगी, जो मक्का पहुँचने की इच्छा तो रखता है और उस अधूरी इच्छा से व्याकुल तो रहता है, लेकिन कभी ब्रिक्स्टन से बाहर ही नहीं निकलता है।
ब्रिक्स्टन से बाहर निकलना ही अपने आप में बड़ी बात है। हममें से ज़्यादातर तो कभी ब्रिक्स्टन से बाहर ही नहीं निकल पाए हैं। हमने तो कभी ट्रैवल एजेंसी में जाकर यह तक नहीं पूछा है कि मक्का जाने का किराया कितना है। और हम ख़ुद को तसल्ली देते हुए यह बहाना बनाते हैं कि दिन में केवल चौबीस घंटे ही होते हैं। और हम जितना कर रहे हैं, उससे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते! हम सभी के अंदर एक अस्पष्ट और असहज इच्छा होती है - ज़िंदगी जीने की इच्छा। अगर हम विश्लेषण करें, तो हम पाएँगे कि इसके पीछे यह विचार होता है कि हमें अपनी ज़िम्मेदारियों के आगे भी कुछ करना चाहिए। अपना और अपने परिवार का पेट पालना अच्छी बात है। बच्चों को पढ़ाना-लिखाना, उनका शादी-ब्याह करना, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना अच्छी बात है।
मोटरसाइकल या कार ख़रीदना अच्छी बात है। ज़मीन या घर ख़रीदना अच्छी बात है। सुबह से शाम तक काम-धंधा, नौकरी या कारोबार करना अच्छी बात है। अच्छा बैंक बैलेंस होना अच्छी बात है। लेकिन क्या इसी का नाम ज़िंदगी है? क्या इतना करके ही हम कह सकते हैं कि हमने अपना जीवन सफलतापूर्वक जिया? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम ज़िम्मेदारियों की चक्की में अपने जीवन को ही पीस रहे हैं और हमें इस बात का अहसास ही नहीं है! ज़िम्मेदारियों के चक्रव्यूह में एक बार घुसने के बाद बाह