आजीवन कारावास
मैं, पुरुष की प्रक्रिती हूँ, एक अपारशक्ती जिसमे क्षीरसागर भी समा जाए ।।मैं, एक माटी की मूरत, जो शास्त्रों में महिषासुर-मरदिनी कह लाए ।।
या फिर एक अमरपक्षी, जो ‘सती’ भस्म कर रोशन हो जाऐ ।।
मैं एक औरत हूँ, एक अन्नत ब्रम्हांड की ताल मेरे रंग में मिलकर ‘शिव’ भी ‘अर्धनारीश्वर’ कह लाए ।।
ये विरोधाभास है या दोहरा मापदंड कि रजस्वला ‘कामाख्या’ पूजित है, वही मेरा मंदिर में रजस्वला साया भी…
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