JM Florence by JM Housing
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@jmhousing45
JM Florence by JM Housing
The Noida Authority’s decision to come up with a new plan to issue the No-Objection Certificate (NOC) on a pro-rata basis has been hailed by realty experts
JM Florence, 2/3 bhk flats in greater noida West
For best deal call us on : 1800 3000 1700 SMS JMO to 54242 visit our website: http://www.jmhousing.in/contact/
(via https://www.youtube.com/watch?v=nPBoKiDXfRw)
(via https://www.youtube.com/watch?v=7suRembQEXQ)
JM Housing posted this photo on 2015-12-23. 1 likes. 0 comments. 0 shares.
Delivering projects on time and assisting in hassle free possessions has now become tag of #JMHousing. It's good to be rated well by your customers and buyers. #JMAroma #possession #buyerreviews #indianrealestate #ncrrealty#noidarealty
(via https://www.youtube.com/watch?v=Sz5eKvn63KA)
Punjab Kesari, a renowned regional news daily covers the views of Mr Rupesh Gupta, Director JM Housing on the recent good sales and increase in demand in realty sector.
Quote of Mr. Rupesh Gupta, Director of JM Housing has appeared in Focus Awaaz Newspaper
J.M. Aroma has appeared in Property Times, Navbharat Times
JM Aroma, JM Florence by JM Housing
माँ दुर्गा जी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चन्द्र और कुन्द के फ़ूल से दी गई है। इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं। भगवती महागौरी बैल के पीठ पर विराजमान हैं। इनकी चार भुजाएँ हैं। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय-मुद्रा और नीचे के दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपर वाले बायें हाथ में डमरु और नीचे के बायें हाथ में वर-मुद्रा है। इनकी मुद्रा अत्यन्त शान्त है। दुर्गा पूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और अत्यन्त फ़लदायिनी है। इनकी उपासना से पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। उपासक सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।
माँ दुर्गा जी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चन्द्र और कुन्द के फ़ूल से दी गई है। इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं। भगवती महागौरी बैल के पीठ पर विराजमान हैं। इनकी चार भुजाएँ हैं। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय-मुद्रा और नीचे के दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपर वाले बायें हाथ में डमरु और नीचे के बायें हाथ में वर-मुद्रा है। इनकी मुद्रा अत्यन्त शान्त है। दुर्गा पूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और अत्यन्त फ़लदायिनी है। इनकी उपासना से पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। उपासक सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन 'सहस्रार' चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम 'शुभंकारी' भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है। माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।
भगवती माँ दुर्गा जी के छठवें स्वरुप का नाम कात्यायनी है ! इनका कात्यायनी नाम पड़ने की कथा इस प्रकार है - कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे ! उनके पुत्र - ऋषि कात्य हुए ! इन्ही कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे ! इन्होने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी ! उनकी इच्छा थी की माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें ! माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली थी ! कुछ काल पश्चात जब दानव महिसासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ़ गया तब भगवान् ब्रह्मा , विष्णु , महेश तीनो ने अपने - २ तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया ! महर्षि कात्यायन ने सर्व प्रथम इनकी पूजा की ! इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाई ! ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायन के यहाँ पुत्री रूप से उत्पन्न भी हुई थी ! आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी , अष्टमी , तथा नवमी तक तीन - दिन इन्होने कात्यायन ऋषि कि पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था ! माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी है ! भगवान् कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्ही की पूजा कालिंदी - यमुना के तट पर की थी ! ये ब्रज मंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित है ! इनका स्वरुप अत्यंत ही भव्य और दिव्य है ! इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला और भास्वर है ! इनकी चार भुजाये है ! माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में है तथा नीचे वाला वर मुद्रा में है ! बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार और नीचें वाले हाथ में कमल - पुष्प सुशोभित है ! इनका वाहन सिंह है ! दुर्गा पूजा के छठवें दिन इनके स्वरुप की उपासना की जाती हैं ! उस दिन साधक का मन 'आज्ञा' चक्र में स्थित होता है ! योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है ! इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में सर्वस्व निवेदित कर देता है ! परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्त को सहज भाव से माँ कात्यायनी के दर्शन प्राप्त हो जाते है ! माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ , धर्म , काम , मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है ! वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है ! उसके रोग , शोक , संताप , भय , आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते है ! जन्म - जन्मान्तर के पापों को विनिष्ट करने के लिए माँ की पूजा - उपासना से अधिक सुगम और सरल मार्ग दूसरा नहीं है ! इनका भक्त निरंतर इनके सानिध्य में रहकर परम पद का अधिकारी बन जाता है ! भगवती देवी माँ कात्यायनी के श्री चरणों में सत सत नमन !
Dedicated to Goddess SkandaMata
नवरात्र के पांचवे दिन मां स्कंदमाता की पूजा इस मंत्र के द्वारा की जानी चाहिए. समस्त इच्छाओं को पूर्ण करनेवाली और आदिशक्ति दुर्गा की पांचवी स्वरूपा भगवती स्कंदमाता की पूजा नवरात्र के पांचवे दिन की जाती है. भगवान स्कन्द की माता होने के कारण श्री दुर्गा के इस स्वरुप को स्कंदमाता कहा जाता है. माता के विग्रह में भगवान स्कन्द बाल रूप में इनके गोद में बैठे हुए हैं. माता की चार भुजाएं हैं, जिनमें दाहिने तरफ की ऊपर वाली भुजा से श्री स्कन्द को पकड़ी हुई हैं. इनका वर्ण पूर्णतः शुभ है और ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं, जिस कारण माता को पद्मासना देवी भी कहा जाता है. आस्थावान भक्तो में मान्यता है कि यदि कोई श्रद्धा और भक्ति पूर्वक मां स्कंदमाता की पूजा करता है तो उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है और उसे इस मृत्युलोक में परम शांति का अनुभव होने लगता है. माता की कृपा से उसके लिए मोक्ष के द्वार स्वयमेव सुलभ हो जाता है. पौराणिक कथानुसार भगवती स्कन्दमाता ही पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती है. महादेव की पत्नी होने के कारण माहेश्वरी और अपने गौर वर्ण के कारण गौरी के नाम से भी माता का पूजन किया जाता है. माता को अपने पुत्र से अधिक स्नेह है, जिस कारण इन्हें इनके पुत्र स्कन्द के नाम से ही पुकारा जाता है.