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सोवियत प्रणाली (SOVIET SYSTEM)
सोवियत प्रणाली समाजवादी व्यवस्था एवं समतामूलक समाज के आदर्शों पर आधारित थी।
विशेषताएं :-
1. यह प्रणाली किसी भी प्रकार की पूंजीवादी व्यवस्था का विरोध करती थी।
2. देश के सभी प्राकृतिक एवं निजी संसाधनों पर समाज के सभी व्यक्तियों का अधिकार हो , इस पक्ष की समर्थन करती थी।
3. सोवियत प्रणाली में कम्युनिस्ट पार्टी को अधिक महत्व प्राप्त दिया गया था।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका :
1. गुटनिरपेक्ष आंदोलन को भारत का प्रोत्साहन मिला तथा भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।
2. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवरहरलाल नेहरू जी ने घाना के वामे एन्क्रूमा , इंडोनेशिया के सुकर्णो , मिस्र के गमल अब्दुल नासिर , युगोस्लाविया के जोसेफ ब्रॉज टीटो आदि देश के नेताओं के साथ मिलकर 1961 में पहला गुटनिरपेक्ष सम्मेलन बेलग्रेड में किया।
3. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का दूसरा सम्मेलन 1964 क़ाहिरा में प्रधानमंत्री लाल बहादुरशास्त्री जी ने विश्व शांति के उदेश्य के लिए किया जिसमें 05 प्रस्ताव रखे गए :-
(i) सीमविवादों को शांतिपूर्ण एवं विवेक ढंग से सुलझाने हेतु।
(ii) अणु शस्त्रों के निर्माण एवं प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने`हेतु।
(iii) अध्यक्ष के रूप में भारत ने पूर्ण निः शस्त्रीकरण के लिए UNO में एक प्रस्ताव पेश किया।
(iv) UNO का समर्थन करने में बल दिया आदि।
शीतयुद्ध (COLDWAR) (USA vs USSR)
Cold War की प्रमुख घटनाएँ :
Cold War के दौरान दुनिया कई बड़े संघर्षों और घटनाओं से गुज़री। बर्लिन से क्यूबा, कोरिया और वियतनाम तक, और अफगानिस्तान तक – ये सब घटनाएँ Cold War की कहानी को दर्शाती हैं।
आप जानते हैं इनमें से कौन सी घटना सबसे खतरनाक थी? 🤔 नीचे कमेंट में बताएं!
दो ध्रुवीय विश्व
द्वितीय विश्वयुद्ध वर्ष 1939 -1945 तक चला और अमेरिका द्वारा जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने के साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया। लेकिन विश्व में कई देशों के मध्य आपसी रक्त -रंजित एवं प्रतिद्वंदिता समाप्त नहीं हुई थीं।
सम्पूर्ण विश्व पर अपना प्रभाव बढ़ाने हेतु और स्वयं को एक शक्तिशाली राष्ट्र दिखाने के लिए अमेरिका ने जापान पर परमाणु बेम गिराये सोवियत संघ ने भी खुद को एक महाशक्तिशाली एवं महाशक्ति घोषित करने के लिए सैन्य शक्ति एवं परमाणु हथियारों का विकास करना प्रारम्भ कर दिया। अब अमेरिका और सोवियत संघ ही ऐसे दो देश बचे थे जो किसी भी देश को आर्थिक , राजनितिक तथा सैन्य शक्ति के आधार पर मात दे सकते थें।
इन दो देशों के बराबर न ही तो कोई विकसित था और न ही इसके गुटों से कोई युद्ध कर सकता था और इस प्रकार पूरा विश्व अमेरिका और सोवियत संघ दो गुटों में बंट गया इसे ही दो ध्रुवीयता का आरम्भ कहा जाता हैं।
गुट-निरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता
भारत की विदेश नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी । गुटनिरपेक्षता का अर्थ किसी भी गुट में शामिल न होना और स्वतंत्र नीति का अनुसरण करना।
यह निम्नलिखित कारणों से आज भी प्रासंगिक है :
यह आंदोलन विकासशील देशों के बीच एकता को बढ़ावा देने और नई वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए एक मंच प्रदान करता है जो उन्हें एक-दूसरे से अलग करते हैं।
जलवायु परिवर्तन, वैश्विक असमानता, दुनिया की आर्थिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय शांति जैसे मुद्दे, जो अब वैश्विक राजनीति में प्रमुख स्थान रखते हैं, किसी एक गुट के बजाय सभी देशों के सहयोग की मांग करते हैं।
कई विकासशील देश अब भी सार्वभौमिकता और तटस्थता को महत्व देते हैं, ताकि वे किसी महाशक्ति के दबाव में न आ सके । ऐसे देशों के लिए गुट-निरपेक्ष आंदोलन महतवपूर्ण भूमिका अदा करता हैं।
यह आश्वासन दिलाता हैं कि वे अपनी संप्रभुता को बनाए रखते हुए वैश्विक मामलों में स्वतंत्र व निष्पक्ष रूप से अपनी स्थिति तथा अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। गुटनिरपेक्षता की नीति सदस्य देशों को सुरक्षा देने के साथ ही विश्व निःशस्त्रीकरण की जरूरत पर भी बल देती है। अतः वर्तमान में ही नहीं बल्कि भविष्य में भी इसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी।
✨ शीत युद्ध के बाद विश्व राजनीति
शीत युद्ध (Cold War) का अंत 1991 में सोवियत संघ (USSR) के विघटन के साथ हुआ। इसके बाद विश्व राजनीति में कई बड़े बदलाव आए:
1️⃣ अमेरिका का उदय – सोवियत संघ के टूटने के बाद अमेरिका (USA) एकमात्र महाशक्ति (Superpower) बनकर उभरा।
2️⃣ संयुक्त राष्ट्र की भूमिका – शांति स्थापना, मानवीय सहायता और संघर्ष समाधान में UN की भूमिका बढ़ी।
3️⃣ वैश्वीकरण (Globalisation) – दुनिया आपस में जुड़ने लगी, व्यापार, तकनीक और सूचना क्रांति तेज़ हुई।4️⃣ आतंकवाद और नए खतरे – 9/11 जैसी घटनाओं ने सुरक्षा चिंताओं को नया रूप दिया।
5️⃣ भारत की भूमिका – भारत ने उदारीकरण (1991) शुरू किया और वैश्विक मंच पर अपनी जगह मजबूत की।👉 शीत युद्ध के बाद की राजनीति ने दुनिया को एकध्रुवीय (Unipolar World) बनाया, जहाँ अमेरिका प्रमुख शक्ति रहा, लेकिन आज चीन, रूस, यूरोपीय संघ और भारत जैसे देश भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
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✨ शीत युद्ध का अंत कैसे हुआ?
1945 से शुरू हुआ शीत युद्ध (Cold War) अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक, राजनीतिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा का दौर था। पर 1980 के दशक के बाद हालात बदलने लगे:1️⃣ सोवियत संघ की कमजोर होती अर्थव्यवस्था – हथियारों की दौड़ ने उनकी अर्थव्यवस्था तोड़ दी।2️⃣ गोर्बाचेव की नीतियाँ (Perestroika & Glasnost) – सुधार और खुलापन लाने की कोशिश।3️⃣ पूर्वी यूरोप में विद्रोह – लोग लोकतंत्र और स्वतंत्रता की ओर बढ़ने लगे।4️⃣ बर्लिन दीवार का गिरना (1989) – शीत युद्ध की प्रतीक दीवार टूटी।5️⃣ सोवियत संघ का विघटन (1991) – इसके साथ ही द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था खत्म हुई।🌍 शीत युद्ध के अंत ने दुनिया को एकध्रुवीय व्यवस्था (Unipolar World) की ओर धकेल दिया, जिसमें अमेरिका सुपरपावर बनकर उभरा।
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गुटनिरपेक्ष आंदोलन
गुटनिरपेक्ष शाब्दिक अर्थ हैं किसी भी गुट से अपनी तटस्था या दुरी बनाये रखना
विश्व राजनीती में गुटनिरपेक्षता का अर्थ उस परिस्थिति से देखा जाता हैं जब कई देशों मे अमेरिका और सोवियत संघ ने एक खेमे मे जाने से खुद को रोका I इस विचारधारा को गुटनिरपेक्ष आंदोलन ककहा गया I -
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत युगोस्लाविया जोसेफ ब्रॉज टीटो , भारत के प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू , मिस्र के गमाल अब्दुल नासिर , इंडोनेशिया के सुकर्णो तथा घाना के वामे एन्क्रूमा द्वारा की गयी I
पहला गुटनिरपेक्ष आंदोलन सम्मेलन वर्ष 1961 में बेलग्रेड में हुआ जिसमे पच्चीस देशों नें भाग लियाI
- इस सम्मेलन में मुख्य तीन बातों का ध्यान दिया गया :-
इन पांचों देशों के बीच आपसी सहयोग I
शीतयुद्ध के प्रसार को कम करना I
अंतराष्ट्रीय स्तर पर बहुत से नव -स्वतंत्रीय अफ़्रीकी देशों का उदय हुआ I
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