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@shastridevjani
प्रचेता ओं के पिता का नाम प्राचीनबही था, प्रचेता ओने भगवान शिव की आराधना करके उनके पास से रूद्र गीता का ज्ञान प्राप्त किया था फिर वह रूद्र गीता के द्वारा नारायण सरोवर में 10000 साल तप किया साक्षात नारायण ने उनको दर्शन दिया और अपना संसार बसाने को कहा.
भगवान ऋषभदेव जी का जन्म जंबूद्वीप के राजा प्रियव्रत के पुत्र नाभि नाम के राजा के वहां पर हुआ था उनकी पत्नी का नाम मेरु देवी था वहां पर भगवान नारायण स्वयं ऋषभदेव बनके पधारे थे, भगवान नारायण ने यह जन्म निवृत्ति मार्ग दिखाने के लिए लिया था,
चलते चलते भरत जी इक्षुमति नदी के किनारे पहुंच गए वहां एक घटना घटी सिंधु सौविर देश के राजा राहुगण कपिल भगवान के आश्रम में सत्संग के लिए जा रहे थे राजा ने अपनी सवारी पालकी में तय की थी तो तो उनको उठाने के लिए चार लोगों की आवश्यकता थी उनको 4 लोग भी मिल गए थे राजा अच्छा था तो उन्होंने थोड़े समय के लिए विश्राम दिया था भोजन इत्यादि करके आगे बढ़ने का तय किया था उतने में ही पालकी उठाने वाला एक वहां से भाग गया
भरत जी ने राजा राहुगण को उपदेश किया कहा राजा अब तो राजा है और हम तो प्रजा है आप दंड देने के योग्य हो हम दंड लेने के योग्य है परंतु यह सब माया के किए हुए भेद है राजन आप शरीर को मार रहे हैं आप हमें नहीं मार रहे हैं मैं तो चिदानंद रूप हूं राजन आप मेरा शरीर देखकर मुझ पर कटाक्ष कर रहे हैं परंतु मेरे शरीर का दुबला पतला होना वह तो उनका गुणधर्म है परंतु आत्मा का नहीं
दूसरा जन्म भरत जी ने यह हिरण के रूप में पाया यह सोच कर उनको बहुत दुख हुआ बहुत पश्चाताप हुआ परंतु किया हुआ कर्मा कभी विफल नहीं जाता इसलिए पूर्व जन्म के कर्मों के प्रभाव से भरत जी को अपना पूर्व जन्म याद था देव योग के कारण उन्होंने सरिता में पूर्व की ओर देखते हुए अपना देह त्याग दिया के बाद उनका जन्म एंगीरा गोत्र के ब्राह्मण के वहां हुआ वह ब्राह्मण को दो पत्नियां थी दूसरी पत्नी से जुड़वा बच्चे प्राप्त हुए उसमें पुत्र के रूप में भगवान भरत जी का जन्म हुआ यहां पर भी उनको अपने पूर्वजन्म का ज्ञान था, क्या कभी ऐसा हो सकता है क्या हमें पूर्वजन्म के वृतांत याद रह सकते है? उसका प्रत्युत्तर है हां जब बालक जब बालक जन्म लेता है तो उसी के साथ ही वह स्तनपान करता है तो वह उसको किसने सिखाया? वह अनेक जन्मों से जानता है.
ऋषभदेव जी के सुपुत्र में से 81 पुत्र कर्मकांड ब्राह्मण हुए उन्होंने कर्म का मार्ग अपनाया 9 पुत्र योगेश्वर का मार्ग अपनाया और नौ पुत्रों ने राज्य पर संभाला सबसे जेष्ठ पुत्र भरत ने राज्य संभाला अपने भाइयों को दिशाओं का राज्य सौंप दिया और खुद चक्रवर्ती सम्राट बन गए वह खूब पराक्रमी थे इसलिए उनके नाम के ऊपर से अपने भारत देश का नाम स्थापित हुआ भरत जी ने शादी रचाई अपना घर संसार बसाया उनको भी पुत्र हुए और दिव्य राज्य किया फिर उसके उत्तराधिकारी को राज्य सौंप दिया और निवृत्ति मार्ग लिया.
संतों ने कहा पुत्री अब तो भगत जी को शांति से मिलकर ही जाएंगे, अजामिल की पत्नी ने कहा अरे महात्मा जी वह आएंगे तो आपको बिना मतलब परेशान करेंगे . उतने में ही अजामिल गांव के चौराहा के पास से निकला और वही और वही खिटपिट वालों ने अजामिल से कहा जय सियाराम भगत जी इतना कहते ही अजामिल की आंख में गुस्सा आ गया. कहां भगत किसको कह रहे हो मुझे जानते नहीं हो क्या , जिसके घर में संतों को भोजन दिया जाता हो वह भगत नहीं तो और कौन, भक्तों के लिए अन्न क्षेत्र खोला है
काम क्रोध लोभ के प्रभाव से बचने के लिए इंसान को क्या करना चाहिए जिसका प्रभाव ज्यादा हो उसका आश्रय लेना चाहिए नाम कीर्तन से नाम स्मरण से नाम चिंतन से इंसान ने किए हुए पाप को वह रोता है और फिर उसका पाप गर्ल जाता है पूर्वक कन्नौज में अजामिल नामक देसीपति ब्राह्मण रहता था ब्राह्मण होकर बिगड़ा था दासी बांसी के संग में ब्राह्मण होकर भी बिगड़ गया ,कोई इंसान जन्म से ही बिगड़ा नहीं होता है उसका संग के संग से ब्राह्मण होकर भी बिगड़ गया था जन में से कोई बिगड़ता नहीं है परंतु कुसंग से बिगड़ता है अजामिल का अर्थ होता है अज यानी माया और मील यानी मिला हुआ जो माया में मिला हुआ है वह अजामिल है.
प्राचीन बही के पुत्र प्रचेता और प्रचेता का पुत्र दक्ष अघमॅशण तीर्थ में जाकर हंसगुह्य स्तोत्र से भगवान नारायण को प्रसन्न किया #भगवानविष्णु ने उसको संसार बसाने को कहा फिर दक्ष ने भगवान की आज्ञा अनुसार पंचजन प्रजापति की पुत्री असिंकी से #विवाह हुआ और उनके वहां पर हरयस्व नाम के 10000 पुत्र हुए
अंतिम प्रकरण में हमने देखा था कि राजा दक्ष की कन्या उसे यह पूरा संसार भर गया कश्यप के साथ जो तेरा कन्या का विवाह हुआ उसमें दिती,अदिती, कद्रू, और वनिता आदि उनकी पत्नियां है दीती दैत्यों की माता है अदिति देवों की माता है देवताओं यानी सद्गुण और असुर यानी दुर्गुण, अदिति यानी ओबेद बुद्धि जिसमें कोई भेद नहीं है, दुर्गुणों का जन्म दीती यानी वह वेद बुद्धि में से उत्पन्न होती है इसलिए उसमें से असुर उत्पन्न होते हैं
Jay Somnath
My name is Shashtri Dev Jani working Priest at Old Somnath Temple. You can contact me for various Puja’s such as Navgrah dosh, Kal sarp Dosh, Mangal dosh, Jap anusthan, Narayan Bali, Pret Bali, Vastu Pujan, Navchandi, Pran-pratishtha, Shrimad Bhagvat Katha etc.
In Somnath, people came across the globe an perform various type Puja such as Rudr abhishek, Dudh abhishek, Maha Mritunjay Jap, Maha Puja, Pathamak Laghu rudra with their hands and seeks blessings for their family and feel the positive energy.
This place is also known as Hari and Har which means First Jyotilinga Somnath and Lord Krishna Moksha Bhumi where you can perform Puja such as Pritra tarpan, Pind dan, Narayan Bali, Pret Bali etc by take the name of your ancestor.
For Jyotish consultant you can contact me on :-9638378024