कबीर साहेब जी ही त्रेतायुग में लंका के राजा रावण के छोटे भाई विभीषण जी को मुनीन्द्र रुप में मिले थे। विभीषण जी ने उनसे तत्वज्ञान ग्रहण कर उपदेश प्राप्त किया और मुक्ति के अधिकारी हुए।

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कबीर साहेब जी ही त्रेतायुग में लंका के राजा रावण के छोटे भाई विभीषण जी को मुनीन्द्र रुप में मिले थे। विभीषण जी ने उनसे तत्वज्ञान ग्रहण कर उपदेश प्राप्त किया और मुक्ति के अधिकारी हुए।
त्रेतायुग में कबीर साहेब मुनींद्र ऋषि नाम से आये। तब रावण की पत्नी मंदोदरी, विभीषण, हनुमान जी, नल-निल, चंद्र विजय और उसके पूरे परिवार को कबीर परमात्मा ने शरण में लिया जिससे उन पुण्यात्माओं का कल्याण हुआ।
कबीर परमेश्वर जी अब्राहिम अधम सुल्तान (बलख बुखारा के राजा) को मिले और सार शब्द का उपदेश कराया।
कबीर सागर के अध्याय "सुल्तान बोध" में पृष्ठ 62 पर प्रमाण है:-
प्रथम पान प्रवाना लेई। पीछे सार शब्द तोई देई।। तब सतगुरु ने अलख लाया। करि परतित परम पद पाया। सहज चौका कर दीन्हा पाना (नाम)। काल का बंधन तोड़ना बगाना।।
42 वर्ष की आयु में श्री मलूक दास साहेब जी को पूर्ण परमात्मा कबीर जी मिले तथा 2 दिन तक श्री मलूक दास जी अचेत रहे, फिर निम्न वाणी उच्चारित कीः-
चार दाग से सतगुरु न्यारा, अजरो अमर शरीर। दास मलूक सलूक कहत है, खोजो खसम कबीर ।। जपो रे मन सतगुरु नाम कबीर। जपो रे मन परमेश्वर नाम कबीर ।।
600 साल पहले कबीर परमात्मा विक्रमी संवत् 1455 (1398 ई.) ज्येष्ठ मास की पूर्णमासी के दिन काशी शहर में लहरतारा तालाब में अवतरित हुये। और काशी के नीरू नीमा नामक निःसन्तान दंपती को मिले।
आदरणीय गरीबदास जी को साहेब कबीर जी के दर्शन दस वर्ष की आयु में सन् 1727 में हुए।
उनको परमात्मा कबीर साहेब जी जिंदा रूप में मिले। आदरणीय गरीबदास जी अपने खेतों में अन्य साथी ग्वालों के साथ गाय चरा रहे थे।
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