आख़री सफ़र
रात हमेशा काली नहीं होती...कुछ रातें यादों से भरी भी होती हैं।तो कुछ रातें इंतज़ार से।और कुछ... मौत से।नवंबर की वह ठंडी हवा पहाड़ियों के बीच से सीटी बजाती हुई गुजर रही थी। सड़क सुनसान थी। दूर-दूर तक कोई रोशनी नहीं, कोई इंसान नहीं, सिर्फ़ धुंध की मोटी चादर और उसके बीच एक पुरानी बस—“विदर्भ ट्रैवल्स”—धीरे-धीरे पहाड़ी रास्ते पर चढ़ रही थी।बस के ऊपर पीली हेडलाइटें थीं, जो धुंध को चीरने की कोशिश कर रही थीं... मगर धुंध जैसे उन्हें निगल रही थी।ड्राइवर रामदास ने सिगरेट का आख़िरी कश लिया और शीशे से बाहर झांका।“ये रास्ता मुझे पसंद नहीं...” उसने बड़बड़ाया।कंडक्टर नरेश टिकट काटते हुए हँसा।“रास्ता नहीं... तेरी उम्र हो गई है अब डरने की।”बस में कुल बारह यात्री थे।एक नवविवाहित जोड़ा,एक बूढ़ी औरत जिसकी आँखें बंद थीं,एक कॉलेज लड़का जो लगातार मोबाइल चला रहा था,एक सूट पहना आदमी जो हर पाँच मिनट में घड़ी देखता था,एक औरत अपनी छह साल की बेटी के साथ,और सबसे पीछे खिड़की के पास बैठा एक आदमी...
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