शहीद अशफाक़उल्लाह ख़ान की Peraonal डायरी जो उन्होने ख़ुद जेल में लिखी थी। अज़ीम इन्क़लाबी शायर और आज़ादी पसंद जंगजूँ आज ही के दिन (22 अक्तूबर ) को शाहजहाँपुर में पैदा हुए थे। उन्हे ब्रिटीश हुक़ुमत के काकोरी ख़ज़ाना लूट केस में 19 दिसंबर 1927 को फैज़ाबाद जेल में मौत की सज़ा सुनाई गई थी। वह आख़िरी सांस तक इंक़लाब ज़िन्दाबाद के नारे लगा रहे थे। इस इल्ज़ाम में शहीद अशफाक उल्लाह खा़ँ के साथ राम प्रसाद बिस्मिल,रोशन सिंह और राजेन्द्र लाहिड़ी को बेगुनाह होते हुए भी सूली पर चढ़ा दिया गया था। मुल्क को आज़ादी मिलने के बाद फैज़ाबाद के इस फांसी घर को शहीद अशफाक़उल्लाह ख़ान के शहादत मक़ाम के तौर पर महफ़ूज़ रख लिया गया। इस मुल्क़ के लिये शहीद हुए तमाम शोहदाअ् को हमेशा याद रखना हमारा फर्ज़ है। उनकी ये इंक़लाबी शायरी उनकी सच्ची सोच बयाँ करती है। कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएंगे, आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे। हटने के नहीं पीछे, डरकर कभी जुल्मों से, तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे। बेशस्त्र नहीं हैं हम, बल है हमें चरख़े का, चरख़े से ज़मीं को हम, ता चर्ख़ गुंजा देंगे। #ashfaqullahkhan https://www.instagram.com/p/B36rgKBl-VC/?igshid=1xew5np1wplt9