भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 57 भावार्थ : जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है॥57॥ भौतिक जगत् में सदा ही कुछ न कुछ उथल-पुथल होती रहती है-उसका परिणाम अच्छा हो चाहे बुरा । जो ऐसी उथल-पुथल से विचलित नहीं होता, जो अच्छ (शुभ) या बुरे (अशुभ) से अप्रभावित रहता है उसे कृष्णभावनामृत में स्थिर समझना चाहिए। जब तक मनुष्य इस भौतिक संसार में है तब तक अच्छाई या बुराई की सम्भावना रहती है क्योंकि यह संसार द्वैत (द्वंद्वों) से पूर्ण है। किन्तु जो मन से स्थिर है वह अच्छाई या बुराई से अछूता रहता है क्योंकि उसका सरोकार कृष्ण से रहता है जो सर्वमंगलमय हैं। ऐसे मनुष्य पूर्ण ज्ञान की स्थिति प्राप्त कर लेता है, जिसे समाधि कहते हैं। यह भगवत गीता सीरीज का अंग है आप पहले के श्लोक मेरी पिछली पोस्ट में जाकर देख सकते हैं, और आगे के भाग के लिए कृपया मेरे साथ बने रहे । . . . . . . #bhagwadgita #bhagwadgitalearnings #bhagvadgitainhindi #bhagvadgitaasitis #geetashloka #geetadarshan #geetadarshan #gitaasitis #wordsofwisdom #wordsoftheday #wordsofencouragement #motivationalwords #motivationoftheday #motivationalspeaker #motivational #movitionalquotes #hindiqoutes #sanskritshloka (at Paris , The City Of Love) https://www.instagram.com/p/CMMAEr7Fxbo/?igshid=s94kik7y170i










