सबूत का भार एक ऐसी धुरी है जिस पर सम्पूर्ण साक्ष्य विधि घूमती है।" कथन की विस्तार से व्याख्या
सबूत का भार - एक परिचय - हमारी न्याय व्यवस्था सबूत पर आधारित है। माननीय न्यायालय के निर्णय सबूत पर ही निर्भर करते हैं। यही कारण है कि पक्षकारों से सबूत पेश किए जाने की अपेक्षा की जाती है। साक्ष्य विधि उन सिद्वान्तो का उल्लेख करती है जिनके माध्यम से न्यायालय किसी तथ्य विशेष को स्वीकार या अस्वीकार करता है| वस्तुतः सबूत पेश करना जितना कठिन नहीं है उतना कठिन यह तय करना है कि सबूत का भार किस पर होगा ? सबूत का भार मामले की परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है, जिस कारण इसका महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। सबूत के भार को 'सिद्धि भार (Burden of Proof) भी कहा जाता है। सबूत का भार क्या है ? परिभाषा - साक्ष्य अधिनियम की धारा 101 में सबूत के भार की परिभाषा दी गई है, इसके अनुसार - जो कोई न्यायालय से यह चाहता है कि वह ऐसे किसी विधिक अधिकार या दायित्व के बारे में निर्णय दे, जो उन तथ्यों के अस्तित्व पर निर्भर है, जिन्हें वह प्रख्यात करता है, उसे साबित करना होगा कि उन तथ्यों का अस्तित्व है। जब कोई व्यक्ति किसी तथ्य का अस्तित्व साबित करने के लिए आबद्ध है, तब यह कहा जाता है कि उस व्यक्ति पर 'सबूत का भार (Burden of Proof)’ है। इस परिभाषा के अनुसार – जब कोई व्यक्ति किसी तथ्य विशेष को साबित करने के लिए बाध्य हो, तब यह कहा जा सकता है कि, उस व्यक्ति पर सबूत का भार है| सामान्यतः यह बाध्यता या दायित्व उस व्यक्ति का होता है जो न्यायालय के समक्ष किसी बात का अभिकथन करता है और न्यायालय से यह अपेक्षा करता है कि वह उसके अनुरूप अपना निर्णय दे। सबूत के भार के प्रकार (types of burden of proof) – फिफ्सन के अनुसार सबूत के भार को जब न्यायिक कार्यवाही में उपयोग किया जाता है तब इसके दो स्पष्ट अर्थ निकलते है – (i) किसी मामले को स्थापित करने का भार - इसके अनुसार सबूत का भार उस पक्षकार पर होता है जो न्यायालय से उन अमुक तथ्यों के, जिन्हें वह प्राख्यात करता है अस्तित्व के बारें में कोई विनिश्चय चाहता है| (ii) साक्ष्य पेश करने के कर्त्तव्य या आवश्यकता के अर्थ में सबूत का भार – किसी तथ्य के सम्बन्ध में सबूत पेश करने के अर्थ में सबूत का भर स्थिर नहीं रहता है, यह पेश किये गए तथ्य तथा विधि की उपधारणा के अनुसार एक पक्षकार से दुसरे पक्षकार पर बदलता रहता है| साक्ष्य अधिनियम की धारा 102 से 112 तक में उन कार्यवाहियों का उल्लेख किया गया है जिनमें किसी पक्षकार पर सबूत का भार होता है। (1) सबूत का भार किस पक्षकार पर होता है (धारा 102) (2) विशिष्ट तथ्य के बारे में सबूत का भार (धारा 103) (3) साक्ष्य को ग्राह्य बनाने के लिए जो तथ्य साबित किया जाना हो, उसे साबित करने का भार (धारा 104) (4) अपवादों के अन्तर्गत मामला आने पर सबूत को भार (धारा 105) (5) विशेषतः ज्ञात तथ्य को साबित करने का भार (धारा 106) (6) उस व्यक्ति की मृत्यु साबित करने का भार जिसका तीस वर्ष के भीतर जीवित होना ज्ञात है (धारा 107)(7) यह साबित करने का भार कि वह व्यक्ति जिसके बारे में सात वर्ष से कुछ नहीं सुना गया है, जीवित है (धारा 108) (8) भागीदारों, भू-स्वामी और अभिधारी, मालिक और अभिकर्ता के मामलों में सबूत का भार (धारा 109) (9) स्वामित्व के बारे में सबूत का भार (धारा 110)(10) उन संव्यवहारों में सद्भाव का साबित किया जाना जिनमें एक पक्षकार का सम्बन्ध सक्रिय विश्वास का है (धारा 111)(11) विवाहित स्थिति के दौरान में जन्म होना धर्मजत्व का निश्चायक सबूत (धारा 112) इस प्रकार धारा 101 से 112 तक में सबूत के भार के बारे में प्रावधान किया गया है। वस्तुतः सबूत के भार पर ही सम्पूर्ण साक्ष्य विधि आधारित है या यह कह सकते है कि सबूत का भार एक ऐसी धुरी है जिस पर सम्पूर्ण साक्ष्य विधि घूमती है। संदर्भ – भारतीय साक्ष्य अधिनियम 17वां संस्करण (राजाराम यादव) Read More - सिद्धि भार से क्या तात्पर्य है? सामान्यतया सिद्धि भार किस पर होता है ? Read the full article











