क्या वाकई हर बार इंटरव्यूअर का फ़ैसला सही होता है?
ज़िंदगी में कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जो लंबे समय तक सवाल छोड़ जाते हैं – खुद पर, सिस्टम पर और उस निर्णय प्रक्रिया पर जिससे हमारा भविष्य तय होता है।
हाल ही में मेरे साथ एक ऐसा ही वाक़या हुआ जो अब भी दिल और दिमाग़ दोनों को झकझोर रहा है।
मैं और मेरे एक सहयोगी – एक ही टीम में काम करते थे। पूरी टीम की नज़र में वो व्यक्ति हमेशा एक non-performer रहा।
उसका व्यवहार, डेली टार्गेट्स और काम के प्रति लापरवाही – ये सब बातें बार-बार उसके ख़िलाफ़ top-level मैनेजमेंट तक पहुंचीं और फीडबैक हमेशा निगेटिव ही रहा।
दूसरी ओर, मुझे टीम का best performer माना जाता था।
चाहे काम की बात हो, टीम स्पिरिट हो या इनोवेशन – हर स्तर पर मैंने खुद को साबित किया और भरोसेमंद बना कर दिखाया।
लेकिन जब एक नई कंपनी में इंटरव्यू देने का मौका आया, तो कुछ ऐसा हुआ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
मुझे रिजेक्ट कर दिया गया और उसी non-performer सहयोगी को उस कंपनी ने चुन लिया।
कई दिन बीत गए लेकिन आज तक ये समझ नहीं आया कि किस वजह से मुझे रिजेक्ट किया गया।
काश कारण पता चल पाता, तो शायद मैं खुद को और बेहतर बना पाता।
🤔 इस घटना ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया:
क्या वाकई हर बार इंटरव्यू लेने वाला सही निर्णय लेता है?
क्या वो हर बार टैलेंट को सही पहचान पाता है?
क्या एक अच्छा CV, performance या potential कभी-कभी overlook नहीं हो जाते?
कई बार ऐसा लगता है कि इंटरव्यू एक skill नहीं, एक luck game होता है।
शायद सामने वाला उस वक़्त क्या सोच रहा था, क्या मूड था, क्या bias था – ये सब आपके fate को बदल सकता है।
📌 इस ब्लॉग के माध्यम से मैं सिर्फ़ अपनी बात नहीं कह रहा, बल्कि हर उस टैलेंटेड इंसान की आवाज़ उठा रहा हूं जिसे कभी बिना वजह रिजेक्ट कर दिया गया।
🎯 शायद ये भी सच हो कि टैलेंट को हर बार पहचाना नहीं जाता, और यही वजह है कि कई बार रिजेक्शन talent की हार नहीं, सिस्टम की कमज़ोरी होती है।