समय निकाला था आज खुद के लिए... और ज़िन्दगी मुस्कुरा दी
मेरी ताक़त भी "dedication" है और मेरी कमज़ोरी भी। काम के प्रति जो समर्पण है, वही मेरा सबसे बड़ा strength है — पर अपने लिए समय ना निकाल पाना, वही मेरा सबसे बड़ा weakness है।
आज पहली बार — ना कोई मीटिंग, ना कोई कॉल... बस खुद के लिए लंच ब्रेक लिया। और घर गया। जब दरवाज़ा खोला — बच्चों की हँसी सुनाई दी, बीवी की मुस्कान दिखी — ऐसा लगा जैसे जैसे पूरी दुनिया की खुशी थाली में परोसी गई हो।
ना जाने कितने दिन बीत चुके थे, जब दिन के उजाले में अपने बच्चों को देखा हो — वरना तो सुबह वो स्कूल चले जाते हैं और मैं सिर्फ उनका बस्ता देख पाता हूं, उनका चेहरा नहीं।
आज का लंच, सिर्फ खाना नहीं था — वो एक टुकड़ा था उस ज़िन्दगी का, जिसे मैं रोज़ मिस करता हूं।
पर सच जानिए — ये रोज़ नहीं होगा... मैं चाहूं भी तो नहीं कर पाऊंगा...
क्योंकि ज़िन्दगी एक रेस है — और मैं उस रेस का वो दौड़ता हुआ हिस्सा हूं जो खुद से मिलने के लिए भी सांस नहीं ले पाता।
और हां, एक बात और है — कहते हैं, "कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती" तो शायद मैं भी अपनी आदतों और अपनी dedication की टेढ़ी लकीर में ही बंधा हूं। काम के लिए, सब के लिए... लेकिन खुद के लिए नहीं।
💬 "जो लंच में मिला आज — वो खाना नहीं, जिंदगी का स्वाद था..."









