गाँव “भैरवपुर” अपने शांत माहौल और पुराने किस्सों के लिए जाना जाता था। छोटा-सा कस्बा, चारों तरफ़ खेत और दूर-दूर तक फैली पगडंडियाँ। दिन में यहाँ की ज़िंदगी बिल्कुल साधारण थी — सुबह लोग खेतों में निकलते, बच्चे मिट्टी में खेलते, और शाम होते ही चौपाल पर बेंचों पर बैठकर ताश और गपशप में वक्त बीतता।उस शाम भी सब कुछ वैसा ही था। अक्टूबर का महीना था… हवा में हल्की ठंड घुल चुकी थी। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था और खेतों के पार से नारंगी रंग की रोशनी फैल रही थी। कहीं दूर से आती ट्रेन की सीटी इस सन्नाटे को तोड़ देती, और फिर जैसे सब कुछ फिर से शांत हो जाता।गाँव के पुराने लोग अकसर कहते थे — “सर्दी की शामों में धुंध जब ज़मीन को छूती है… तब कुछ आवाज़ें भी साथ चली आती हैं।” लेकिन युवा पीढ़ी इन बातों को हँसी में उड़ा देती थी।