धारणा एवं पुराण !
दिल्ली/26-05-2021
धारणा से है उपद्रव ? धारणा से बंधे लोग कभी भी उस छितिज को नहीं देख पावेंगे जो सरल और प्रत्यक्ष है ,लेकिन प्रदे की ओट में ! मै किसी और धर्मों पर या हिन्दू धर्म पर टीका- टिप्पणी के उद्येश से नही बल्कि जो भी मैंने स्वंय से पढ़कर जानने की कोशिश में पाया है उसी को लिख रहा हूँ !
भारतीय समाज ने बहुत कुछ हासिल की है ! इस समाज ने उस मुकाम को छू लिया है जहाँ पर पहुंचना शायद ही किसी सभ्यता की वश की हो ! यदि एक तरफ मैं गीता को ही रख दूं तो विश्व की कोई पुस्तक भी इसकी ऊँचाई को छूने में सक्षम नही ! यह बात मै इसलिए कह पा रहा हूँ क्योंकि लगभग सभी पश्चात् विद्वानों में से जो नाम आधुनिक युग जानता है उनका अध्यन मैं कर चूका हूँ ! दर्शन शास्त्र में ना अरस्तु में वह धार है और ना ही प्लूटो में जो कृष्ण की गीता वचन में हैं !
मैं यहाँ अरस्तु को या प्लूटो को कहने के लिए नही बल्कि पौराणिक धारणाओं और भारतीय मूल सिद्धांतों में जो अंतर पाया है उसे कहने को हूँ ! मेरे देखे भारतीय समाज कभी भी अपने मूल्यों के प्रति प्रमाणिक नही हो सका ! कुछ महत्वपूर्ण एवं मुलभुत मंत्र को छोड़कर उन सभी वस्तुओं को स्वीकार करता चला गया जो आब एक वर्तुलीय अभिशाप के रूप में चारों ओर पसर चूका है !
गीता ,रामायण एवं महाभारत और चार दर्शन के आलावा जितने भी पुराण हैं सभी मनगढ़ंत कहानी हैं ! लोग आते गए और टीका करते गए ! परिणाम में समय के साथ विशाल ग्रंथों की ढेर लग गयी ! कौन पढ़ पायेगा ये बकबास कथा ! पुरानों को मैं पढ़ने लगा तो सब मनगढ़ंत किस्सागोई ! मैं पढ़ने के बाद बहुत निर्णय पर पहुँच गया की कुशल पंडितों ने सुखभोग के लिए विशाल समाज को जाल में लपेट लिया ! एक ऐसी जाल जिसमे उलझकर लोग मरते गए और पुनरुक्ति इतना प्रबल है की इसे युगों युगों तक काटना संभव नही !
लिंग पुराण में एक किस्सा है ! शिव भगवान क्रोधित हो उठे तो सभी असुरों का वध करने लगे l सभी असुर जलकर भस्म हो रहे थे ! उन असुरों में एक मायासुर नामका एक राक्षस भी था ! वह डरकर शिव की आराधना करने लगा ! शिव को उसने इसतरह से पुकारा की शिव प्रसन्न हो गए और मायासुर से कहा की वह वर मागें ! मायासुर कहता है - हे प्रभु , आप दयालु हैं ! आप मुझे ये वर दें की मैं सदा दीनहीन की सहायता करता रहूँ ! मुझमे कभी भी अहंकार ना आये , मै किसी जीव को ना सताऊँ ! शिव यह सुनकर अति प्रसन्न हो उठते हैं और कहते हैं - मायासुर , तुम धन्य हो और अति सरल ह्रदय ! जाओ , तुम सपरिवार जाकर वितललोक में जाके वास करो ! वह स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर है ! यह सुनकर मायासुर वितललोक चला जाता है !
अब मायासुर को आप क्या कहियेगा ? वह दानव था ? मेरे हिसाब से तो वह एक संत से कम न था ! खैर , आगे तो अभी और रहस्य है ! पढ़िए !
यही मायासुर राक्षस एकबार खांडव वन में रहता था ! राक्षस था , बहुत उपद्रवी था तो कृष्ण इसे वध करने लगे तो यह अर्जुन के पास पहुँच गया और अर्जुन ने इसे कृष्ण की कोप से बचा लिया ! मायासुर चुकी जोयोतिशी और वास्तुशास्त्र में निपुण था इसलिए वह कृतज्ञता भाव में पांडवों को मयसभा भवन बना कर दी !
ये तो कुछ भी नही ! ब्रम्ह्पुरान में तो हद ही कर दिया है ! मायासुर का एक भाई था जिसकी हत्या इंद्र ने कर दी ! मायासुर कुपित हो उठा और घोर तपस्या करने लगा ! तपस्या को देखकर इंद्र डर गए जैसे वे हमेशा डर जाते थे ! वह ब्राम्हण का भेष बदल कर मायासुर से मैत्री करने पहुंचे ! जब मैत्री हो गयी तो वह असली रूप में आ गए ! चुकी मायासुर ने मित्र मान लिया था इसलिए उसने इंद्र को जीवनदान देकर विधिपूर्वक मायाज्ञान की शिक्षा भी दी !
अब कहिये , इसे क्या कहियेगा ! एक दानव जो ज्योतिश्चार्य भी है , शिल्पकार भी है और मायाज्ञान भी है ! शिव के कहने पर वितललोक में रहता है और अगले पल कृष्ण युग में ! आगे तो पढ़कर आप चोंक उठेंगे ! यह मायासुर रावन का ससुर है ! यानि मंदोदरी का पिता ! ये रामयुग में भी है !
पंडितों ने चालाकी से महाभारत और रामायण की कथा में से पात्र को लेकर तरह तरह की बकबास लिखने के अलावा और कुछ नही किया है ! जब इसयुग में लोग धर्म को लेकर इतना संवेदनशील हैं ,फिर तो यह पुराण है ! क्या आप कल्पना नही कर सकते की कितनी कुशलता से पुरोहितों ,ऋषियों ने जाल निर्मित की है ! जब मोहमद और जीसस इन पद्रह सौ /दो हजार साल में लोगों के मन में रचबस गए हैं ,फिर तो ये मामला श्रृष्टि के उत्पन की है ! पांच दस हजार साल का मामला है ! क्या अब ये संभव है की इस जाल से निकला जाय !
साम्यवादी विचारधारा के लोगों ने तो कुछ हदतक लोगों को जागृत किया है लेकिन सम्पूर्णता में इसे हासिल करना संभव नही है ! मेरे कईं मित्र हैं जो साम्यवादी हैं लेकिन घर में पूजा या नमाज पढने जरुर जाते हैं ! वे अन्दर से डरे हुए हैं की अनीति हो जायेगी यदि ईश्वर के विरूद्ध गए ! रूस और चीन में मामला अलग है ! इन सौ बर्षों में स्मय्वादी नेताओं ने बहुत हद तक सभी को विश्वास दिला दी है की भगवान नामका कुछ भी चीज इस जगत में नही है !
लेकिन ये जो मिशनरी , तिलकधारी और टोपधारी संसार में एक्टिव हैं ,कभी स्वंय से पूछ पाएंगे ? प्रश्न कर पाएंगे ! कहानियों को मिलाने और समझने की चेष्टा कभी करेंगे ? नहीं , ये नही करेंगे ! ये एक डर है जो सदियों पुराना है और इसे तोडा नही जा सकता !
मै रामायण , गीता एवं भारतीय दर्शंशाश्त्र को सबसे उच्च स्थान इसलिए देता हूँ की इसमें कहीं भी दोहरी कहानी और पात्र नही हैं ! किसी पात्र की बात की गयी है तो वे सभी एक युग में हैं ! और मैं इन दोनों महान घटनाओं को एक मनुष्य समाज का कृत मानता हूँ ! कृष्ण भी आदमी थे और राम भी ! बस मेरे लिए यही सच है !
मै तो सभी से आग्रह करना चाहूँगा की जहाँ तक हो सके ग्रंथों को पढ़िए ! एक भक्त की तरह नहीं बल्कि एक जिज्ञासु की तरह ! बिलकुल ऐसे जैसे आप जानते ही नही कुछ और अभी अभी पढना सुरु किया है ! आपने यदि सही से अध्यन कर लिया तो सबकुछ स्पष्ट हो जायेगा !
_दिशव


















