दिल्ली एअरपोर्ट पर एक दोस्त ने आदिल हुसैन को देखा. उसने उन्हें इश्किया, लाइफ ऑफ़ पाई, इंग्लिश-विन्ग्लिश और पार्च्ड में देखा था.
पर हममें से कुछ लोगों के लिए वो "जासूस विजय" है. myember?
2000s की शुरुआत में "जासूस विजय" दूरदर्शन की स्क्रीन पर आया. विजय एक जासूसी में तल्लीन, गंभीर किरदार है जो अपराधों की पहेलियाँ सुलझाने के लिए गाँवों में जाता है. ये अपने आप में बहुत अनूठा था. हमारे सिनेमा और लेखक-वर्ग ने पश्चिमी film-noir को जरा से भारतीयकरण के बाद यथावत् अपनी किताबों और फिल्मों में उतार दिया. बहुत ही कम फिल्में और धारावाहिक भारत में अपराध को उस नज़रिए से दिखा पाए. "जासूस विजय" उनमें से एक था.
जासूस विजय ओवरकोट नहीं पहनता और पाइप सुलगाते हुए अँधेरी गलियों में डामर पर जूतों की आहटों का पीछा नहीं करता. वो गाँवों में होने वाले साधारण से दिखने वाले अपराधों की जटिलता और विचारधारा को सामने लाता है (शर्ट-पेंट पहन कर).
इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि जासूस विजय ने मनोरंजन के माध्यम से लोगों को HIV से अवगत करवाया. शो की हर कड़ी में अपराध की कहानी से गुंथा एक एड्स/HIV+ किरदार होता है जिसे जासूस विजय समझता है, परामर्श देता है. समाज में सामान्य जीवन जीने में मदद करता है. ग्रामीण लोगों को बताता है कि ये बीमारी वाकई में कैसे फैलती है. जिन लोगों ने बचपन में ये शो देखा है उनके लिए सेक्स की किताब में एक अध्याय सुरक्षा का भी है.
विजय ऐसा इसलिए करता है क्योंकि वह खुद HIV+ है. उसकी सहायक और अनुगामी भावी जासूस, गौरी को जब ये पता चलता है तो वो परेशान हो उठती है और विजय के भूतकाल के बारे में आधी बनी राय लेकर विजय को नियुक्त करने वाले अधिकारी के पास जाती है:
"विजय जी मेरे लिए एक मिसाल थे."
"क्या वो अब एक मिसाल नहीं है?"
मिसालें दीं जातीं हैं, भुलाई नहीं जातीं.